ठीक है?

[कुछ बोलिये न मैडम, आप क्यों चुप हैं – अच्छा नहीं लगता]

दस्तक

[आम चुनाव में हार के बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के बाद लिखा यह पीस एक मैगजीन - 'सनद रहे' में प्रकाशित हो चुका है. मैगजीन में प्रूफ की गलतियां रह गई थीं. ये ओरिजिनल पीस है.]

ग्राउंड जीरो पर
[10, जनपथ]
जुटने से काफी पहले,
लेकिन - अरसा बाद,
कुछ भी ऐन पहले जैसा नहीं था
[युवा जोश ने कट्टर सोच बदल दी थी]
आलाकमान से असहमति जताने का
मौका सदियों बाद आता है
जब सन्नाटे की कोई वजह नहीं पूछता
पीले पड़ चुके पन्नों पर लिखी इबारत
फिर से बांची जानी थी
कुछ बातें अब भी नहीं बदली थीं, उनमें
हां में हां मिलाते चंद चेहरों की कोटरी
भी शामिल थी.

बैठक

मैं सोनिया गांधी
[नहीं मॉम, मैं राहुल गांधी]
नहीं, हम
[अहमद पटेल, जनार्दन द्विवेदी, जयराम रमेश, अंबिका सोनी... और सब]
पिछले दस साल की
[सभी ऊंच-नीच]
उपलब्धियों की निजी
[और कुछ सार्वजनिक भी]
तौर पर जिम्मेदारी लेते हुए
इस्तीफा
[नहीं चलेगा! नहीं चलेगा!]
देने का फैसला
[पार्टी हित में]
वापस लेती हूं.

रुख़सत

मैं फलाना सिंह
[एक – अभूतपूर्व - वेतनभोगी]
दुर्घटनावश या दुर्घटनाग्रस्त
[एक कुर्सी का केयरटेकर]
अब तक की तमाम बातों की तरह
चुनावों में हुई ऐतिहासिक हार की
[बगैर कोई चुनाव लड़े]
चुपचाप
[नि:शब्द]
जिम्मेदारी
[ताकि पेंशन पर कोई आंच न आए]
लेता हूं
[कुछ बोलिये न मैडम, आप क्यों चुप हैं – अच्छा नहीं लगता]
ठीक है?
# मृगाङ्क शेखर

DISCLAIMER:This is a pure work of fiction. All the names, characters, businesses, places, events and incidents are either the products of the author’s imagination or used in a fictitious manner. Any resemblance to actual persons, living or dead, or actual events is purely coincidental. Hereby, it is said that there is no intention of mocking anybody's prestige or hurt at heart anyone, anyways.

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