तो क्या ब्राह्मण वोटों के बगैर मायावती का जीतना नामुमकिन है?

हाथी को चुनावी इम्तिहान में 'शून्य' मिला है. बीएसपी नेता मायावती का कहना है कि दलित तो उनके साथ थे, मगर ब्राह्मण गुमराह हो गए - और इसीलिए उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश में हार का मुंह देखना प़ड़ा.

इसी तरह इस चुनाव में मुलायम सिंह यादव का परिवार तो जीत गया, मगर पार्टी के सारे उम्मीदवार हार गये.

दस्तक

“यूपी में ब्राह्मण समाज ने भी मुझे वोट नहीं दिया, वो भी गुमराह हो गया.”
- मायावती, नेता, बीएसपी

बैठक

वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार लिखते हैं:
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को जो पांच सीटें मिली है, वे सभी मुलायम सिंह के परिवार को गई हैं। आजमगढ़ और मैनपुरी से ख़ुद मुलायम सिंह। कन्नौज से उनकी पतोहू डिम्पल यादव। बदायूं से उनके भतीजे धर्मेंद्र यादव और फिरोजबाद से उनके एक और भतीजे अक्षय यादव। याद रखिए कि मुलायम के बेटे अखिलेश यादव पहले ही मुख्यमंत्री बने हुए हैं। एक भाई शिवपाल यादव अखिलेश सरकार में मंत्री हैं और दूसरे भाई रामगोपाल यादव पहले ही राज्यसभा सदस्य हैं।
इतना ही नहीं, कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में जो दो सीटें मिली हैं, वे दोनों भी एक ही परिवार को गई हैं। रायबरेली से सोनिया गांधी। अमेठी से राहुल गांधी। भाजपा ने भी इसी परिवार के दो मां-बेटों को जिताया है। पीलीभीत से मेनका गांधी और सुलतानपुर से वरुण गांधी।
यानी जनता ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को ख़ारिज तो कर दिया, लेकिन उसके परिवारवाद-वंशवाद को शत-प्रतिशत स्वीकार कर लिया। मोदी-लहर में बीजेपी की हर चीज़ तो उसे कबूल है ही। जनता का फ़ैसला सिर आंखों पर, लेकिन क्या उसके ऐसे विवेक पर आपका मन भी प्रश्नचिह्न लगाने को हो रहा है?

रुख़सत

चुनाव नतीजों पर अपनी प्रतिक्रिया में मायावती ने कहा, “कांग्रेस की मेहरबानी पर मुलायम अपने घर की सीटें बचा पाये.”
दिलचस्प बात ये है कि समाजवादी पार्टी ने जिन पांच सीटों पर जीत हासिल की है उनमें से तीन पर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे.

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