माफ करना, मुझे चैन की नींद सोना है

File Cartoon: By Ganesh
तो क्या
मैं
संविधान की नाक पर
रूमाल बाँधकर निष्ठा का तुक
विष्ठा से मिला दूं?

दस्तक

बीस साल पहले बनारस में एक तोहफा मिला था - संसद से सड़क तक. जब तब पन्ने पलट लिया करता हूं. खासकर तब जब कुछ सवालों के जवाब नहीं मिलते.
इस बार धूमिल की यह किताब हाथ में लेते ही लगा जैसे वह वाई-फाई हॉट स्पॉट बन गई - और मैं एक वर्चुअल वर्ल्ड से अचानक कनेक्ट हो गया. घूमने लगा बनारस की उन्हीं शांत दिव्य और सुकूनभरी बेहद खूबसूरत गलियों में. मगर काफी फर्क नजर आ रहा था. हर तरफ शोर, भीड़ और मछली बाजार जैसा माहौल. हर कोई अपना माल बगलवाले की तुलना में ज्यादा बढ़िया बता बेचने को आतुर दिखा. कोई तरक्की के लिए आजमाये हुए नुस्खे का मॉडल पेश कर रहा था तो, कोई एस्केप वेलॉसिटी की सवारी का का झांसा दे रहा था. कुछ लोग हर किसी को टोपी पहनाने को आतुर दिखे तो एक शख्स अपने माल को लोकल और बाकियों के सामान को घटिया किस्म का इम्पोर्टेड माल बता कर अपने तरीके से समझाने की कोशिश कर रहा था.
बाजार में कहीं कहीं हरेक माल... जैसी आवाजें भी सुनाई दे रही थीं.
लोग सुन तो सबकी रहे थे – मगर चुपचाप गुजरते जा रहे थे. कुछ अकेले, कुछ साथ में और कुछ समूहों में.
आम मुसाफिरों की तरह – बस यूं ही, शायद अपनी मंजिल की ओर.
[कृपया ध्यान दें - ये आम रास्ता नहीं है – आगे पोलिंग बूथ है]
किताब के पन्ने तो पुराने ही थे, पर उनमें कुछ नये शब्द उग आए नजर आ रहे थे.
शायद कुछ पल के लिए.

बैठक

आरोप
घेराव में किसी बौखलाये हुये
नेता
[कुछ आम आदमी भी]
का
[संक्षिप्त एकालाप नहीं]
पॉलिटिकल कोरस है, और
लफ्फाजी
[कभी कविता रही होगी]
शब्दों की अदालत में
[अपराधियों के कटघरे में खड़े?]
मीडिया के बूते मैदान में
कीचड़ लेकर कबड्डी खेलते
कुछ क्लीन चिटधारियों
[एक निर्दोष आदमी?]
का
का महज मेनिफेस्टो है
[हलफनामा है?], आखिर
मैं
[‘आप’, ‘मैं’ या फिर से ‘हम’?]
क्या करूँ?
आप ही जवाब दो?
नियम और कानून को ताक पर रख
[तितली के पंखों में पटाखा बाँधकर]
चुनावी माहौल
[भाषा के हलके]
में
कौन सा गुल?
[कमल?]
खिला दूं?
जब ढेर सारे नेताओं का गुस्सा
[कुछ दोस्त भी होंगे, आपस में]
सोशल मीडिया पर
[लेकिन हाशिये पर नहीं]
चुटकुला बन रहा है.
क्या मैं?
संविधान
[व्याकरण]
की नाक पर
रूमाल बाँधकर,
निष्ठा का तुक,
विष्ठा से मिला दूं?

रुख़सत

क्या?
[सुनो! अब ज्यादा दिन नहीं हैं]
अपने नाम का वो हिस्सा,
[अच्छे दिन आने वाले हैं?]
हटा दूं?
जिसके साथ मैं पैदा हुआ
जिसकी बदौलत मैं
कड़े इम्तिहनों से गुजरते हुए
उस मुकाम पर पहुंचा - जहां,
चुनौती के तौर पर
[और तोहफे में भी]
तारीफ कम और तोहमत ज्यादा मिलती है
और...
आज से पहले तो
किसी ने मेरी ईमानदारी पर
उंगली उठाई नहीं!
तो - क्या इमानदारी का
नया सर्टिफिकेट लेने के वास्ते,
महज नए परिवेश में
नई निष्ठा जोड़ने के वास्ते
अपने नाम के उस हिस्से को बदल दूं?
माफ करना यार
मुझे नाज है!
अपनी इमानदारी पर
अपनी निष्ठा पर
[सिर्फ देश और संविधान के प्रति]
आगे भी मुझे
चैन की नींद सोना है.

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