सियासी सारथी

KNOW MORE: एक चालाक सोशल और पॉलिटिकल इंजीनियर
आखिर कौन है यह अमित शाह नाम का शख्स? क्यों नरेंद्र मोदी जैसी शख्सियत उन पर इतना भरोसा करती है? भाजपा जैसी पार्टी ने कैसे यूपी जैसा महत्वपूर्ण राज्य उनके हवाले कर दिया? मजे की बात यह है कि इस शख्स ने अपने ऊपर भरोसा करने वाले किसी भी व्यक्ति को निराश नहीं किया और कामयाबी के झंडे गाड़ इतिहास रच दिया। जाहिर है आपके भी दिल और दिमाग में ऐसे सवाल उठ रहे होंगे।
शिकागो में गुजरात मूल के बड़े व्यंवसायी अनिलचंद्र शाह के घर 1964 में अमित शाह का जन्म हुआ था। अमित ने बायोकेमेस्ट्री में बीएससी तक शिक्षा प्राप्त की। साथ ही पिता के व्य्वसाय से जुड़ गए। मोदी से अमित की पहली मुलाकात अहमदाबाद में लगने वाली संघ की शाखाओं में हुई थी। बचपन से ही दोनों इनमें जाया करते थे। हालांकि ख्यातिलब्ध व्यवसायी के बेटे अमित के मुकाबले मोदी एक बेहद सामान्य परिवार से ताल्लुक रखते थे।
जानकारों की माने तो अमित शाह व आनंदी बेन के बीच लंबे समय तक शीत युद्ध भी चलता रहा। दोनों के साथ काम कर चुके शंकरसिंह वाघेला कहते हैं, ‘दोनों बहुत अलग-अलग स्वभाव के लोग है. शाह जहां षडयंत्र वाले कामों में महारत रखते हैं वहीं आनंदी की प्रशासन पर बेहतर पकड़ रही है।’ साथ ही मोदी को अच्छी तरह से मालूम है कि दोनों का कहां और कैसे इस्तेमाल करना है। नतीजा आपके सामने है।
युवावस्था में अचानक मोदी हिमालय (लोगों की माने तो वे तपस्या करने निकले थे) की ओर कूच कर गए। जबकि उनके मित्र शाह संघ से जुड़े रहते हुए शेयर ट्रेडिंग तथा प्लास्टिक के पाइप बनाने के अपने पारिवारिक व्यापार से जुड़ गए। अस्सी के दशक में मोदी फिर वापस लौटे और संघ की गतिविधियों में शिरकत करने लगे। साथ ही दोनों यार एक बार फिर मिल गए। शाह उन दिनों संघ से तो जुड़े थे, मगर व्यवसायी के तौर पर ही सक्रिय थे। उन्होंने मोदी से भाजपा में शामिल होने की अपनी इच्छा जाहिर की। मोदी की सिफारश पर तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष शंकर सिंह वाघेला ने उन्हें पार्टी से जोड़ा। इसके बाद अमित शाह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1991 में लालकृष्ण आडवाणी ने गांधीनगर से चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की। जिम्मेदारी मोदी के कहने पर अमित शाह को सौंपी गई। इसी तरह 1996 में गांधीनगर सीट से अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव लड़ने पहुंचे। इस बार भी कमान अमित शाह के हाथ रही। इन दोनों कामयाबियों ने बतौर इलेक्शन मैनेजर नरेंद्र मोदी और अमित शाह को दिग्गज नेताओं की नजर में स्थापित कर दिया। शुरुआत में वाघेला के पास अमित शाह को लेकर जिम्मेदारी दिलवाने के लिए मोदी गए थे। हालांकि वाघेला की माने तो भाजपा की जिम्मेदारी मिलने के बाद अमित शाह उनकी जासूसी करते रहे। वे अंदरुनी बातें मोदी तक पहुंचाते रहे। केशुभाई पटेल के जमाने में भी अमित शाह की भूमिका यही रही। वे तब दिल्ली में रह रहे नरेंद्र मोदी को पटेल की गतिविधियों से संबंधित हर जानकारी देते रहे। आखिरकार अमित शाह की रणनीति ने कमाल दिखाया कि मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बन गए। जाहिर है अमित शाह भाजपा से ज्यादा मोदी के करीबी हैं। यह अमित शाह के गणित का ही कमाल था कि मोदी लगातार तीसरी बार गुजरात में सत्ता में लौटे। गुजरात में कांग्रेस के डेढ़ दशक के एकाधिकार को खत्म कर वहां के कोआपरेटिव सोसाइटियों और क्रिकेट संघ पर भी अमित शाह ने कब्जा कर लिया। नतीजा सबके सामने हैं। आज गुजरात में कांग्रेस अपने बल पर उठकर खड़ी होने की स्थिति में भी नहीं। अमित शाह को यूपी की जिम्मेदारी सौंपे जाने के लिए सबसे बड़ी वजह यही थी।
मोदी के राज में अमित शाह के पास राज्य मंत्री होते हुए भी दस से ज्यादा विभाग थे। साथ ही 90 फीसदी कैबिनेट समितियों के वे सदस्य हुआ करते थे। चुनावी राजनीति में माहिर अमित शाह के नाम यह रिकॉर्ड भी है कि अपने जीवन में उन्होंने अभी तक कुल 42 छोटे-बड़े चुनाव लड़े, लेकिन उनमें से एक में भी उन्होंने हार का सामना नहीं किया. यूपी में नरेंद्र मोदी के करीबी होने का ही लाभ उठाकर ही अमित शाह ने कामयाबी हासिल की। यूपी के भाजपाई दिग्गज जानते थे कि यह शख्स आदेश न मानने पर मोदी का कान भर पत्ता साफ कर सकता है। इसलिए चुपचाप हर बात स्वीकार किए। नतीजा सबके सामने है। भाजपा को ऐतिहासिक कामयाबी मिली। अमित शाह की ही भांति आनंदीबेन भी नरेंद्र मोदी की बेहद करीबी मानी जाती रही हैं। जानकारों की माने तो अमित शाह व आनंदी बेन के बीच लंबे समय तक शीत युद्ध भी चलता रहा। दोनों के साथ काम कर चुके शंकरसिंह वाघेला कहते हैं, ‘दोनों बहुत अलग-अलग स्वभाव के लोग है. शाह जहां षडयंत्र वाले कामों में महारत रखते हैं वहीं आनंदी की प्रशासन पर बेहतर पकड़ रही है।’ साथ ही मोदी को अच्छी तरह से मालूम है कि दोनों का कहां और कैसे इस्तेमाल करना है। नतीजा आपके सामने है। सोहराबुद्दीन शेख की फर्जी मुठभेड़ के मामले में अमित शाह को 2010 में गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा। फर्जी मुठभेड़ मामले में जेल में बंद पुलिस के निलंबित अधिकारी डीजी बंजारा ने अमित शाह और नरेंद्र मोदी पर यह आरोप लगाया था। सनद रहे कि इस फर्जी मुठभेड़ मामले में 31 से ज्यादा अधिकारी जेल में बंद है। बंजारा का कहना था कि वे नरेंद्र मोदी को भगवान की तरह मानते थे। मगर उन्हें अफसोस है कि उनका भगवान अमित शाह जैसे शैतान के प्रभाव से नहीं मुक्त हो सका। मुख्यमंत्री के बाद अब नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाने में भी अमित शाह की भूमिका ऐतिहासिक रही। विरोधी भी मानते हैं कि अमित शाह एक चालाक, सोशल और पॉलिटिकल इंजीनियर हैं। अब सीबीआई भी सकते में है। आखिर वह अमित शाह से कैसे पार पाएगी। दूसरी तरफ दुनिया के सबसे समृद्ध क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई में हलचल तेज हो गई है। मुमकिन है अमित शाह वहां भी महारत दिखाएं।
# विजय शंकर पांडेय [लेखक वरिष्ठ पत्रकार है - और ये उनके निजी विचार हैं]
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2 comments:

  1. ab to ye king maker ho gaya hai !

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  2. हर दौर में एवं हर राजनीतिक दल में एक ऐसा शख्स होता है जो अपनी कारगुजारियों से,सही-गलत के पैमाने से इतर,दल को लाभान्वित करता है।

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