उम्मीदवार भी वैसे ही चुनें जैसे वर या वधू ढूढते हैं

कार्टून : गणेश
"सही उम्मीदवार पहचानने के मापदंड क्या हैं, और यह भी कि 2014 लोकसभा में वैसे उचित उम्मीदवार कौन कौन थे?" वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार ने फेसबुक पर ऐसे सवालों के जवाब में एक पोस्ट लिखी है, जिसे हम आपके लिए पेश कर रहे हैं.
[बेहतर होता ये सवाल-जवाब चुनाव से पहले या उस दौरान पूछे गये होते. अच्छी चीजों की कोई खास वैलिडिटी नहीं होती इसलिए भविष्य के लिए संजो लेना चाहिए. वैसे भी चुनावों का मौसम ज्यादा दूर नहीं है. दिल्ली, झारखंड, उत्तराखंड और बिहार में चुनावी बादल मंडराने लगे हैं. - मॉडरेटर]

दस्तक

दुर्भाग्य यह कि हम एक लड़की के लिए लड़का ढूंढ़ते हुए अथवा एक लड़के के लिए लड़की ढूंढ़ते हुए जितनी सतर्कता बरतते हैं, उतनी भी एक उम्मीदवार को चुनते हुए नहीं बरतते हैं।
अगर किसी पिता को शादी से पहले पता चल जाए कि लड़का दारूबाज है तो वह अपनी बेटी की शादी उससे किसी कीमत पर नहीं करेगा या उसे पता चल जाए कि लड़की चरित्रहीन है, तो वह अपने बेटे की शादी उससे किसी कीमत पर नहीं करेगा,
उसी तरह आपको अपने उम्मीदवारों के चयन में कुछ न्यूनतम पैमाने तो तय करने ही होंगे।

बैठक

यह सवाल बेहद वाजिब है और जवाब बेहद आसान है। आप सभी लोग इसका जवाब जानते हैं। फिर भी आपने पूछा है, तो बता रहा हूं। एक आदर्श उम्मीदवार में कुछ गुणों का होना ज़रूरी है। जैसे-
चुनाव में सिर्फ़ इस बात का इम्तिहान नहीं होता है कि उम्मीदवार कितना काबिल है, बल्कि इस बात का भी इम्तिहान होता है कि वोटरों में कितना विवेक है।
  • ईमानदार हो। रिश्वतखोर न हो। लालची न हो। जिसकी भूख इतनी बड़ी न हो कि आप सबको खाकर भी डकार न ले।
  • साफ-सुथरी छवि हो। चरित्रवान हो। देशभक्त हो।
  • धनबल-बाहुबल के असर से दूर हो। 
  • ग़रीबों-मजदूरों-किसानों-नौजवानों-शोषितों-वंचितों-पीड़ितों समेत समाज के हर तबके का दोस्त हो।
  • जातिवादी या सांप्रदायिक न हो। जो व्यक्तियों, जातियों, संप्रदायों के तुष्टीकरण की बजाय सौ फीसदी लोगों के कल्याण के लिए काम करने का इरादा और मजबूती रखता हो। 
  • स्थानीय जनता में उसकी उपलब्धता हो और वह उनके मुद्दों और दुख-दर्द को समझता हो। जो दूसरों के दुख से दुखी हो जाता हो। जो दूसरों के लिए रोता हो, दूसरों के लिए हंसता हो। 
  • जो सबको अपना मानता हो। भाई-भतीजावाद, बीवी-सालावाद, बेटा-पतोहूवाद न करता हो। 
  • अपने इर्द-गिर्द चमचों की टोली लेकर न घूमता हो। 
  • नेतृत्व क्षमता से भरपूर हो। 
  • दूरदर्शी हो। आज के लिए काम करते हुए कल पर जिसकी नज़र रहती हो। 
  • सीधा हो, सरल हो, मृदुभाषी हो, अहंकारी न हो। 
  • जनता को सर्वोपरि मानता हो। लोकतंत्र में गहरी आस्था रखता हो। 
  • इरादों का पक्का हो। जो ठान ले, वह कर दिखाने वाला हो। 
  • मेहनती हो, दिन-रात काम करता हो। संघर्षशील हो। 
  • जो स्वस्थ हो और 70 साल से ज़्यादा का न हो। 
  • समझदार हो। अनपढ़ न हो। पढ़ा लिखा होना बेहद ज़रूरी है।
  • ओजस्वी और तेजस्वी हो। संसद या विधानसभा में जब वह बोले, तो देश अथवा राज्य मंत्रमुग्ध हो जाए। 
  • आपका नेता, आपका प्रतिनिधि, आपका सांसद, आपका विधायक लाखों में एक होना चाहिए, न कि हर गली-नुक्कड़ पर उग आने वाले कुकुरमुत्तों जैसी उसकी जात और औकात हो।
अब यह मत पूछिएगा कि आप कैसे पता लगाएंगे कि किसी उम्मीदवार में ये सारे गुण हैं कि नहीं। जैसे मैं कैसा पत्रकार हूं, आप आसानी से समझ सकते हैं, उसी तरह कोई कैसा उम्मीदवार है, यह भी जनता आसानी से समझ सकती है।

रुख़सत

चुनाव में सिर्फ़ इस बात का इम्तिहान नहीं होता है कि उम्मीदवार कितना काबिल है, बल्कि इस बात का भी इम्तिहान होता है कि वोटरों में कितना विवेक है।
बाकी मैने जो बताया है, वह आदर्श पैमाना है। उसमें से जितने पर वह खरा उतर सके, उतना बेहतर। आप जितने ऊंचे पैमाने तय करेंगे, आपको उतने बेहतर उम्मीदवार मिलना शुरू हो जाएंगे। आपने पैमाना ही बहुत नीचे रखा हुआ है, इसलिए बेहतर उम्मीदवारों का अकाल पड़ा हुआ है। राजनीति की मजबूरी है कि उसे जनता की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के हिसाब से होना पड़ेगा। लेकिन जनता राजनीति को मजबूर नहीं कर पा रही, बल्कि ख़ुद मजबूर हो जा रही है।

[ये लेखक के निजी विचार हैं. फॉर्मैट के हिसाब से मूल पोस्ट के सिक्वेंस में लेखक की अनुमति से थोड़ी तब्दीली की गई है.]

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