पहचान कौन?

जनता के सारे भरम तोड़ डाले अरविंद केजरीवाल ने
केजरीवाल की बीमारी सिर्फ़ यह नहीं है कि वे ख़ुद को छोड़कर बाकी सबको चोर, बेईमान, भ्रष्ट मानते हैं, बल्कि उनकी बीमारी यह भी है कि वे ख़ुद को छोड़कर बाकी सबको मूर्ख, बेवकूफ़, अनपढ़ भी मानते हैं। बार-बार वे जो माफ़ी मांगते हैं, वह इसी बीमारी का लक्षण है।
उन्हें लगता है कि वे माफी मांग लेंगे और जनता फिर से उनके झांसे में आ जाएगी। जब हम लोग कह रहे थे कि केजरी भाई आप गलत कर रहे हैं, तब तो वे हमें अपना दुश्मन समझते थे और उनके तमाम लोग इस तरह से हम पर हमले कर रहे थे, जैसे हम कोई देशद्रोही हों और केजरी भाई अकेले देशभक्त। जबकि सच्चाई यह है कि हमने केजरी भाई की जितनी भी आलोचनाएं कीं, इस दर्द के साथ कीं, कि एक आदमी जिसपर देश ने इतना भरोसा किया, वह अति-महत्वाकांक्षा, रातों-रात सब कुछ हासिल करने की चाह, फूहड़पन और सस्ती पब्लिसिटी की भूख के चलते सब कुछ मिटा लेने पर तुला हुआ है। मैंने पहले भी लिखा था कि केजरी भाई ने देश को किसी भ्रष्ट से भ्रष्ट नेता से भी ज़्यादा नुकसान पहुंचाया है। उनकी वजह से अब यह पीढ़ी किसी आंदोलन और आंदोलनकारी पर भरोसा नहीं करेगी और आने वाले समय में निश्चित रूप से देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। हम लोग लगातार महसूस कर रहे हैं कि केजरीवाल की हल्की हरकतों के कारण समाज में हम सबकी विश्वसनीयता कम हो गई है। हमारी जिन बातों को पहले समर्थन मिलता था, जनता अब उसे कपोल-कल्पना, अति-आदर्शवादिता या लोगों को बेवकूफ़ बनाने वाली बात कहकर ख़ारिज करने लगी है। लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद भी केजरी भाई की गतिविधियां शर्मनाक रही हैं। वे किस मुंह से दिल्ली में दोबारा सरकार बनाने का इरादा पाल बैठे? जब उन्हें पता था कि बीजेपी उन्हें समर्थन देगी नहीं, तो उनके लिए दोबारा कांग्रेस से समर्थन की आस रखना निकृष्ट कोटि की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सत्तालोलपुता नहीं तो और क्या है? राज्यपाल नजीब जंग को चिट्ठी लिखकर अभी विधानसभा भंग न करने का अनुरोध करना क्या यह नहीं जताता कि तथाकथित ईमानदार और साफ़-सुथरी राजनीति के इस अगुवा को सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ करने तक से परहेज नहीं है? जब कांग्रेस के सारे नेताओं ने इस बार एक सुर में कह दिया कि आम आदमी पार्टी को दोबारा समर्थन नहीं देंगे, तो वे जनता से माफी मांग रहे हैं। ऐसी माफी पर कोई घनघोर बेवकूफ़ ही उन्हें माफ़ करेगा। उन्होंने दूसरी पार्टियों की तरह झूठ, पाखंड और शिगूफों की राजनीति की। जाति और संप्रदाय की राजनीति की। धनबल और बाहुबल की राजनीति की। आम आदमी के नाम पर पैसे वालों, अपराधियों-बाहुबलियों और फ़र्ज़ी लोगों का जमघट तैयार करने से भी परहेज नहीं किया। लोकतंत्र और संविधान की गरिमा कम करने की कोशिश की। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में ज़बर्दस्त कामयाबी के बाद केजरीवाल ने लगातार जनता के विश्वास को कुचला। 1. कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का उनका फ़ैसला पहली बड़ी भूल थी। यह अवसरवादी राजनीति का वैसा ही नमूना था, जैसा दूसरे राजनीतिक दल दिखाते रहे हैं। 2. शपथग्रहण-समारोह से लेकर अपनी सुरक्षा, सरकारी आवास और गाड़ी के मसले पर लगातार नौटंकियां करना उनकी दूसरी बड़ी भूल थी। उनकी नौटंकियों की वजह से उनकी सरकार अधिक ख़र्चीली साबित हुई, सुरक्षा एजेंसियों को अधिक परेशानी उठानी पड़ी और लोगों को लगा कि सबकुछ पब्लिसिटी स्टंट का हिस्सा है। 3. अपने नालायक, बदज़ुबान और फूहड़ मंत्री सोमनाथ भारती का बचाव करना उनकी तीसरी बड़ी भूल थी। यह सेम ग्राउंड पर दूसरों को ग़लत और अपने को सही ठहराने का वैसा ही दोहरापन था, जैसा दूसरे राजनीतिक दल दिखाते रहे हैं। 4. मुख्यमंत्री होते हुए कुछ सिपाहियों और दारोगाओं को सस्पेंड कराने के लिए धरने पर बैठना उनकी चौथी बड़ी भूल थी। ऐसा करके उन्होंने मुख्यमंत्री पद की गरिमा को गिरा दिया। सिपाही को सस्पेंड कराने के लिए मुख्यमंत्री धरने पर बैठ जाएगा? 5. गणतंत्र दिवस परेड को बाधित करने का उनका एलान पांचवीं बड़ी भूल थी। ऐसा करके उन्होंने देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत किया। गणतंत्र दिवस के बारे में उन जैसी राय उनसे पहले हमने सिर्फ़ नक्सलियों और आतंकियों के हवाले से सुनी थी। 6. ग़लत भूमिका बनाकर सरकार का जबरन इस्तीफा दे देना उनकी छठी बड़ी भूल थी। उनकी सरकार को कोई गिराना नहीं चाहता था, लेकिन अपने राजनीतिक लाभ के लिए वे ग़ैरकानूनी तरीके से जनलोकपाल बिल पास कराना चाहते थे। उन्होंने ज़बर्दस्ती इस्तीफ़ा दिया और बड़े झूठ का परिचय देते हुए बीजेपी और कांग्रेस पर इसकी ज़िम्मेदारी डाली। 7. औकात से ज़्यादा सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ना उनकी सातवीं बड़ी भूल थी। इसकी वजह से न उन्हें अच्छे उम्मीदवार मिले, न वे ढंग से चुनाव लड़ पाए, न प्रचार कर पाए। अगर दिल्ली का मुख्यमंत्री रहते हुए वे सिर्फ़ 50 या 100 सीटों पर चुनाव लड़ते, तो आज उनकी 25 से ज़्यादा लोकसभा सीटें हो सकती थीं। 8. मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना उनकी आठवीं सबसे बड़ी भूल थी। मोदी के सिवा वे किसी के भी ख़िलाफ़ खड़े हो जाते, तो जीत भी सकते थे और पार्टी को फायदा भी पहुंचा सकते थे। मोदी को निशाने पर लेकर उन्होंने युवाओं को चिढ़ा दिया। 9. मीडिया से हर वक़्त फेवर की चाह रखना और ऐसा न होने पर उनपर हमले करना उनकी नवीं बड़ी भूल थी। नतीजा यह हुआ कि जिस मीडिया ने उन्हें सिर पर बिठा रखा था और एक वक़्त में मोदी से भी ज्यादा कवरेज दिया, उसी मीडिया ने बीच चुनाव में उन्हें पटक दिया। 10. बार-बार थप्पड़ खाकर उन्होंने अपनी बची-खुची गंभीरता खो दी। यह उनकी दसवीं बड़ी भूल थी। ज़्यादातर लोगों ने तो यह समझा कि वे पब्लिसिटी और सहानुभूति के लिए ख़ुद ही अपने ऊपर हमले करवा रहे हैं। अपने ऊपर हमला करने वालों के घर जाकर उन्हें माफ़ करने का नाटक करके उन्होंने एक तरह से इस थ्योरी की पुष्टि कर दी। अब आखिरी बात यह कह रहा हूं कि केजरी भाई, पंजाब की जनता ने आपको बचा लिया है। अभी भी आपकी राजनीति ख़त्म नहीं हुई है। अगर आपमें थोड़ी भी सूझ-बूझ बाकी है, तो धैर्य और संयम से काम लीजिए और ग़लतियों से सबक लेकर ख़ुद को दुरुस्त कीजिए। पंजाब में आपके चार सांसद हैं। दोबारा चुनाव होने पर दिल्ली विधानसभा में आप मुख्य विपक्षी दल बन ही जाएंगे। हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी कुछ सीटें ला सके, तो छोटे-छोटे ही सही, तीन राज्यों में आपकी मौजूदगी हो जाएगी और यहां से आपका सिलसिला अब भी आगे बढ़ सकता है। पर क्या अपने शुभचिंतकों को अपना दुश्मन समझना और अपने आपको सर्वाधिक होशियार और ईमानदार समझना आप कभी बंद कर पाएंगे? अगर नहीं, तो जनता को आपसे बची-खुची सहानुभूति भी जल्द ही समाप्त हो जाएगी। शुक्रिया।

# अभिरंजन कुमार [लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं । ये उनके निजी विचार हैं] 

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