क्या इस बार दो पार्टियों का चुनाव-ख़र्च उठा रही है कांग्रेस?


क्या कांग्रेस इस बार दो पार्टियों के चुनाव लड़ने का ख़र्च उठा रही है- एक अपना और दूसरा आम आदमी पार्टी का?
आम आदमी पार्टी ने रायबरेली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ कोई मज़बूत उम्मीदवार नहीं दिया। (दिया भी है कि नहीं, स्पष्टीकरण आवश्यक। पार्टी की वेबसाइट पर अर्चना श्रीवास्तव का नाम है, जबकि मीडिया में जस्टिस फ़ख़रुद्दीन का नाम आया था। एक प्रमुख राष्ट्रीय चैनल पर आज सुना कि वहां से कोई उम्मीदवार नहीं है।)
दूसरी तरफ़, वाराणसी में आम आदमी पार्टी के 'अध्यक्ष' (संयोजक) अरविंद केजरीवाल के ताल ठोंकने के बाद कांग्रेस ने भी अभी तक वहां से अपने उम्मीदवार का एलान नहीं किया है। (यहां भी कन्फ्यूज़न है, क्योंकि पार्टी की वेबसाइट पर वाराणसी और अरविंद केजरीवाल का नाम नहीं है। तो क्या, दोनों पार्टियों के बीच अभी तक यह दुविधा बरकरार है कि वाराणसी में किस तरह की अंडरस्टैंडिंग कायम की जाए? क्या अरविंद के खड़ा होने की सूरत में कांग्रेस अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगी या कांग्रेस के उम्मीदवार खड़े करने की सूरत में अरविंद बैठ जाएंगे?)
दिल्ली विधानसभा चुनावों तक आम आदमी पार्टी कांग्रेस और बीजेपी दोनों के ख़िलाफ़ बोलती रही और उसका मुख्य नारा भ्रष्टाचार से लड़ाई का था। लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने के बाद उसके कांग्रेस-विरोध की आवाज़ नरम पड़ती गई और अब वह पूरी तरह से भाजपा और मोदी-विरोध पर केंद्रित हो चुकी है। अब उसका मुख्य नारा भ्रष्टाचार से लड़ाई का नहीं, बल्कि सांप्रदायिकता से लड़ाई का है।
सूत्रों के मुताबिक अपने दामाद रॉबर्ट वाड्रा को बार-बार डिफेम किए जाने से सोनिया गांधी बेहद नाराज़ थीं। इसी नाराज़गी को दूर करने के लिए आम आदमी पार्टी ने न सिर्फ़ रॉबर्ट वाड्रा का नाम लेना तक बंद कर दिया, बल्कि "डीएलएफ लैंड डील" मामले में उन्हें महज कुछ ही घंटों के भीतर क्लीन चिट दे देने वाले पूर्व राजस्व आयुक्त युद्धवीर सिंह को भी हिसार से टिकट दे दिया, ताकि सोनिया गांधी को यह क्लीयर मैसेज चला जाए कि आम आदमी पार्टी "भूल-सुधार" कर चुकी है।

पार्टी ने अमेठी में राहुल गांधी के ख़िलाफ़ कुमार विश्वास को ज़रूर उतारा है, लेकिन इसके पीछे मंशा राहुल गांधी को हराना नहीं, बल्कि कुमार विश्वास की राजनीतिक बलि देना बताया जा रहा है। आम आदमी पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि पार्टी के भीतर एकमात्र कुमार विश्वास ही हैं, जिनसे भविष्य में अरविंद केजरीवाल को चुनौती मिल सकती है, इसलिए उन्हें "वीरगति" दिलाई जा रही है।

ग़ौरतलब है कि दिल्ली विधानसभा चुनावों तक आम आदमी पार्टी कांग्रेस और बीजेपी दोनों के ख़िलाफ़ बोलती रही और उसका मुख्य नारा भ्रष्टाचार से लड़ाई का था। लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने के बाद उसके कांग्रेस-विरोध की आवाज़ नरम पड़ती गई और अब वह पूरी तरह से भाजपा और मोदी-विरोध पर केंद्रित हो चुकी है। अब उसका मुख्य नारा भ्रष्टाचार से लड़ाई का नहीं, बल्कि सांप्रदायिकता से लड़ाई का है। कांग्रेस और नीतीश स्टाइल में टोपी भी पहनी जा रही है, टीका भी लगाया जा रहा है।
उपरोक्त जानकारियों को तर्क की कसौटी पर परखने के लिए आम आदमी पार्टी की वेबसाइट पर दिये गए कुछ आंकड़ों पर ग़ौर किया जा सकता है।
वेबसाइट के मुताबिक -
-दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद 12 दिसंबर 2013 से पिछले 116 दिन में उसे मात्र 23 करोड़ रुपये का डोनेशन मिला है।
-यानी प्रतिदिन उसे औसतन 20 लाख रुपये से भी कम चंदे में मिले हैं।
-चुनाव के आखिरी दौर के ख़त्म होने यानी 12 मई में अभी 35 दिन बाकी हैं।
-गणित लगाएं तो लगता है कि इन 35 दिनों में उसे 7 करोड़ रुपये और मिल जाएंगे।
-यानी कुल 30 करोड़ रुपये।
-इसी 30 करोड़ रुपये की "घोषित रकम" के बूते इस पार्टी ने देश की कुल 543 लोकसभा सीटों में से अब तक 431 पर उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं।
-औसत लगाएं तो पार्टी प्रति लोकसभा सीट 7 लाख रुपये से भी कम ख़र्च करने वाली है, जबकि ख़ुद चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को एक लोकसभा सीट पर 70 लाख रुपये तक ख़र्च करने की छूट दे रखी है।

अपुष्ट अनुमानों के मुताबिक लोकसभा चुनाव में एक औसत उम्मीदवार चुनाव आयोग द्वारा मंजूर सीमा से करीब 10 गुना या उससे भी अधिक ख़र्च करता है (5 करोड़ रुपये से लेकर 10-15 करोड़ तक), फिर आम आदमी पार्टी मंजूर सीमा के दसवें भाग से भी कम ख़र्च में चुनाव कैसे लड़ रही है? यह सवाल तब और प्रासंगिक हो उठता है, जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी के ख़र्च पर ग़ौर करते हैं। वहां मात्र 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए पार्टी ने 20 करोड़ रुपये जुटाए थे, फिर वह मात्र 30 करोड़ रुपये में 431 लोकसभा सीटों पर, जो कि 3000 से ज़्यादा विधानसभा सीटों के बराबर बैठती हैं, किस प्रकार चुनाव लड़ रही है?

सूत्र बताते हैं कि आम आदमी पार्टी निश्चित रूप से कांग्रेस और बीजेपी के मुकाबले कम ख़र्च कर रही है, लेकिन इसके बावजूद इतने पैसों में इतनी सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ना असंभव है। दरअसल कांग्रेस के रणनीतिकार भीतर ही भीतर यह मान चुके हैं कि यह चुनाव उनका नहीं है, इसलिए आख़िरी उम्मीद के तौर पर आम आदमी पार्टी को उन्होंने बीजेपी के वोट काटने की मुहिम पर लगाया है। उसे उम्मीद है कि अगर यह पार्टी हर सीट पर बीजेपी के 5 हज़ार से 50 हज़ार वोट भी काट पाई, तो कांटे के मुक़ाबले वाली सीटों पर उसके उम्मीदवारों को हराया जा सकता है। और ऐसी सीटों की संख्या 10 से लेकर 50 तक हो सकती है। कांग्रेस को उम्मीद है कि अगर उसका गणित काम कर गया, तो बीजेपी को रोकना आसान हो जाएगा।

...तो क्या सचमुच कांग्रेस इस बार दो पार्टियों का चुनाव ख़र्च उठा रही है- एक अपना और दूसरा आम आदमी पार्टी का?
# अभिरंजन कुमार [लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं । ये उनके निजी विचार हैं]

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