मोदी के खिलाफ मैदान में कांग्रेस ने पुराने भाजपाई को ही उतारा

बनारस में बीजेपी की बिछाई सियासत की बिसात पर कांग्रेस ने बेहतरीन चाल चली है. कांग्रेस की यह चाल बीजेपी के पीएम कैंडिडेट को मात तो नहीं दे सकती, पर शह जरूर दे रही है.

कौन हैं अजय राय?

अजय राय ने 1996 में अपनी राजनीतिक पारी की धमाकेदार शुरुआत की. अजय राय ने सीपीआई विधायक ऊदल को शिकस्त दी और रातों रात सुर्खियों में छा गए. कोलअसला ने नौ बार के विधायक ऊदल को हराना तब मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन माना जाता था.
तब अजय राय बीजेपी के ही टिकट पर चुनाव लड़े थे – और 2009 में वाराणसी लोक सभा सीट से पार्टी का टिकट मांग रहे थे. जब बीजेपी ने अपने बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी को उम्मीदवार बनाया तो अजय राय ने पार्टी छोड़ दी और चुनाव लड़ने के लिए समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया.
वैसे अजय राय इलाके में कभी भी अननोन फेस नहीं थे. उन दिनों लोग उन्हें अवधेश राय के भाई के तौर पर जानते थे, जिनकी 1991 में हत्या कर दी गई थी. हालांकि, अजय राय को अपनी भूमिहार बिरादरी का पूरा साथ तब मिला जब बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय को सरेआम गोली मार दी गई. उसके बाद से पूरा भूमिहार तबका अजय राय के पीछे एकजुट होकर खड़ा हो गया ताकि इलाके में एकतरफा माफिया दबदबे की हालत में वह बैलेंसिंग फैक्टर का काम कर सकें.
जब वाराणसी सीट से मोदी के खिलाफ दिग्विजय सिंह का नाम उछला तो सबसे पहले अजय राय ने ही खुलकर विरोध जताया. अजय राय का कहना था कि दिग्विजय सिंह बड़े नेता जरूर हैं लेकिन पार्टी स्थानीय नेताओं को भी न भूले तो बेहतर होता. टीवी पर चली उनकी साउंडबाइट आत्मविश्वास से भरपूर होने के साथ साथ नेतृत्व के लिए उसमें एक शालीन चेतावनी भी थी.
अजय राय का पूर्वांचल में अपना रुतबा है. उनकी अपनी फॉलोविंग है. उनके लिए काम करने वालों में कांग्रेस के कार्यकर्ता तो हैं ही बीजेपी के भी काफी कार्यकर्ता उनसे जुड़े हुए हैं. विधान सभा चुनावों के बाद से ही अजय राय शहर में लोगों के बीच लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे. चाहे दुर्गापूजा हो या देव दीपावली हो या कोई भी छोटा-बड़ा समारोह अजय राय पूरे साल लोगों के बीच नजर आये.
और, हाल में जब वाराणसी सीट से मोदी के खिलाफ दिग्विजय सिंह का नाम उछला तो सबसे पहले अजय राय ने ही खुलकर विरोध जताया. अजय राय का कहना था कि दिग्विजय सिंह बड़े नेता जरूर हैं लेकिन पार्टी स्थानीय नेताओं को भी न भूले तो बेहतर होता. टीवी पर चली उनकी साउंडबाइट आत्मविश्वास से भरपूर होने के साथ साथ नेतृत्व के लिए उसमें एक शालीन चेतावनी भी थी.

कांग्रेस की समझदारी या मजबूरी

अजय राय को नरेंद्र मोदी के खिलाफ उतारने का फैसला कांग्रेस के राजनीतिक सूझ बूझ का परिचय देता है तो उसकी मजबूरी भी जाहिर करता है.
कांग्रेस के पास कोई भी ऐसा कद्दावर नेता नहीं था जो मोदी लहर का मुकाबला तो करे ही माफिया डॉन मुख्तार अंसारी के खिलाफ भी मजबूती से मैदान में डटा रहे. वैसे 2009 के चुनाव में अजय राय तीसरे स्थान पर रहे लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राजेश मिश्रा से आगे जरूर रहे. कांग्रेस के सीटिंग सांसद राजेश मिश्रा तब लुढ़क कर चौथे स्थान पर पहुंच गए थे. बीजेपी के बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी बड़ी मुश्किल से जीत पाए थे.
वक्त बीतते देर नहीं लगती, अभी अगला चुनाव आया नहीं कि अजय राय का समाजवादी पार्टी से भी मोहभंग हो गया. फिर वह कांग्रेस के टिकट पर नवगठित पिंडरा विधान सभा सीट से चुनाव लड़े और पार्टी के फिसड्डी परफॉर्मेंस के दौर में भी खुद की बदौलत पांचवी बार लगातार विधायक बने.
हाल की चर्चाओं पर गौर करें तो कांग्रेस की ओर से कई वाराणसी सीट के लिए कई नाम उछले. इनमें संकट मोचन के महंत का विश्वभरनाथ मिश्र का भी नाम शामिल था जिन्हें मीडिया में खंडन करना पड़ा. चर्चा थी कि कांग्रेस महंत को उतार कर मोदी के हिंदुत्व असर को कुंद करना चाह रही थी, लेकिन बात नहीं बनी.
अभी ये कवायद चल ही रही थी कि दिल्ली से आनंद शर्मा और राशिद अल्वी भी मोदी से दो-दो हाथ करने पर उतारू नजर आने लगे. अनिल शास्त्री ने तो मोदी के खिलाफ विपक्ष के साझा उम्मीदवार के आइडिया को भी हवा दी.
जहां तक राजेश मिश्रा की बात रही तो उनकी मुस्लिम समुदाय में अच्छी पैठ मानी जाती है. राजेश मिश्रा मुस्लिम वोट तो बटोर सकते थे – लेकिन मोदी का वोट काटना उनके लिए मुश्किल होता. उन्हें कुछ ब्राह्मण वोट तो मिल जाते लेकिन भूमिहार वोट का सवाल ही नहीं उठता. ऊपर से उनका पिछला प्रदर्शन भी आड़े आ गया – और आखिरकार अजय राय के नाम पर मुहर लगी.

मुकाबला एकतरफा, पर मुश्किलें बढ़ीं

आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल के ऐलान के बाद भी बीजेपी समर्थक वाराणसी में मुकाबला एकतरफा ही मान रहे हैं. समाजवादी पार्टी के कैलाश चौरसिया और बहुजन समाजवादी पार्टी के विजय प्रकाश जायसवाल के बाद अब अजय राय के मैदान में उतरने से मोदी की राह उतनी आसान नहीं होगी. जहां तक मुस्लिम वोटों का सवाल है तो उनका बंटवारा कौमी एकता दल के मुख्तार अंसारी के अलावा समाजवादी पार्टी और कुछेक कांग्रेस के बीच होना है. घोटालों और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस की चौतरफा किरकिरी के बावजूद अजय राय व्यक्तिगत संबंधों आधार पर बीजेपी के हिस्से का वोट जरूर बटोरेंगे – इतना तो साफ है.

No comments:

Post a Comment

आपके विचार बहुमूल्य हैं. अपनी बात जरूर रखें: