मिर्च स्प्रे, चाकू, चाय और शराब

अन्ना को बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का ‘चाय पर चर्चा’ कार्यक्रम तो बिलकुल भी नहीं भा रहा है. उनकी राय में चुनावों के दौरान मतदाताओं को शराब परोसने या फिर चाय परोसने में कोई खास फर्क नहीं है.

दस्तक

और बाबूजी! असल बात तो यह है कि जिन्दा रहने के पीछे
अगर सही तर्क नहीं है
तो रामनामी बेचकर या रण्डियों की
दलाली करके रोजी कमाने में
कोई फर्क नहीं है.

बैठक

अन्ना हजारे अब कम बयान देते हैं, शायद लोग सवाल ही कम पूछते हैं. रामलीला आंदोलन के ठीक बाद के कुछ दिनों के मुकाबले.
मीडिया के सवालों पर उनके ताजा बयान से पता चलता है कि वह ममता बनर्जी पर इन दिनों ज्यादा ही मेहरबान हैं – मोदी पर हद से ज्यादा खफा. खास बात यह है कि अरविंद केजरीवाल आंदोलन और सियासत के बीच में कहीं खो से गये हैं. कम से कम अन्ना की नजर में.
अन्ना को बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का ‘चाय पर चर्चा’ कार्यक्रम तो बिलकुल भी नहीं भा रहा है. उनकी राय में चुनावों के दौरान मतदाताओं को शराब परोसने या फिर चाय परोसने में कोई खास फर्क नहीं है.
धूमिल की कविता ही नहीं उनकी किताब का टाइटल
– संसद से सड़क तक –
इस वक्त कुछ ज्यादा ही प्रासंगिक लग रहा है.
‘सड़क से संसद तक’ धूमिल अगर आज होते तो शायद अपनी किताब का नाम भी बदल दिए होते. संसद में मिर्च स्प्रे और चाकू लेकर सांसदों के पहुंचने के बाद इतना तो बनता ही है.
‘शराब की बोतल लेकर वोट देना या कोई चाय पिला दे उसे वोट देना, दोनों ही चीजें सही नहीं हैं.’
धूमिल कल भी प्रासंगिक थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे.
उनकी कविता ही नहीं उनकी किताब का टाइटल – संसद से सड़क तक – इस वक्त कुछ ज्यादा ही प्रासंगिक लग रहा है.
‘सड़क से संसद तक’
धूमिल अगर आज होते तो शायद अपनी किताब का नाम भी बदल दिए होते. संसद में मिर्च स्प्रे और चाकू लेकर सांसदों के पहुंचने के बाद इतना तो बनता ही है.

रुख़सत

चाय पर तमाम चर्चाएं होती हैं. बनारस में पप्पू की दुकान पर तो न जाने कितनी ही चर्चाएं सुबह से शाम तक होती रहती हैं. जिन्हें बनारस जाने का मौका न मिले वह काशीनाथ सिंह की ‘काशी का अस्सी’ पढ़ सकता है. वहां कि चर्चाओं से कहीं बेहतर इसमें उनकी कमेंट्री है.
चाय पर चर्चा के पीछे सही तर्क तो ढूंढना ही होगा.
अभिरंजन कुमार के धूप चाय कार्यक्रम के पीछे सियासी तो नहीं, पर साहित्यिक तर्क हो सकते हैं.
वैसे चाय पर चर्चा मुझे बाद में पता चली. धूप चाय उससे पहले की बात है.
धूमिल ने बहुत पहले ही आगाह किया था. अन्ना ने चाय की सियासत को लेकर अपने तरीके से सावधान किया है. चुनाव के दौरान इससे आप को भी आगाह रहना होगा. आप का मतलब अब आम आदमी पार्टी हो गया है, लेकिन वक्त के साथ मतलब बदलते रहते हैं.

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