आइए सही हिन्दी लिखने का प्रयास करें, ‘अक्षरश:’

किसी झूठ को भी सौ बार बोल दिया जाए तो वह सच लगने लगता है. यह सौ बार कोई निश्चित मात्रा नहीं है, देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से इसमें अपने आप बदलाव संभव है.

दस्तक

राजनीति में यह प्रयोग धड़ल्ले से चल रहा है. कोई किसी झूठ को सच साबित करने में जुटा है, तो कोई किसी सच को झुठलाने में उतनी ही शिद्दत से लगा है.
तफरीह के तौर पर या महज बयानबाजी के लिए तो इसे अहमियत मिले या नहीं – यह अलग बात है.
इसमें सबसे खतरनाक बात तब होती है जब यह सिस्टम का हिस्सा बन जाए या फिर उसे प्रभावित करने लगे.

बैठक

पिछले साल के आखिर में समीक्षा अधिकारी की परीक्षा हुई. उसमें हिंदी का भी एक पेपर था. तमाम प्रश्नों के बीच एक हिंदी की वर्तनी से जुड़ा था.
संयोग से उसी दौरान मेरा भी मथुरा जाना हुआ. एक फोन आया तो पता चला कि पत्नी की एक दोस्त भी वहां पहुंची हुई है. परीक्षा की परीक्षा और मथुरा का मथुरा घूमना. ऊपर से हम लोगों से भेंट. दोनों तरफ खुशियां महसूस की गईं.
फोन पर ही तय हुआ कि साथ में ही डिनर करते हैं. तकरीबन आस ही पास दोनों पार्टियां पूछताछ के बाद एक जगह इकट्ठा हुईं. फिर हम लोग सीता की रसोई पहुंचे. एंबिएंस काफी अच्छा था.
उनका कहना था कि वह कन्फ्यूज हो गई थीं. बार बार उनकी आंखों के सामने बाजारों में पसरे बोर्ड प्रकट हो जा रहे थे. हर तरफ उन्हें ‘आर्शीवाद’ ही नजर आ रहा था. शायद केबीसी की तर्ज पर उन्होंने ऑडिएंस के साथ जाने का फैसला किया – और भीड़ में शामिल हो गईं.
बात चल रही थी. बहुत सारी बीती बातें थीं. मेरे लिए सारी नई, लेकिन ज्यादातर उबाई ही. उनके साहब और हमारे भाई साहब भी दुनिया की कम चीजों में ही रुचि लेने वाले दिखे. न उनका खाने पीने की चीजों में इंटरेस्ट था और न ही देश दुनिया की बातों में. यहां तक कि अन्ना हजारे या फिर हमारे मिस्टर खामोश में भी नहीं. बातों बातों में भाई साहब अपने ऑफिस की बात जरूर करते. उनकी नजर में जिस दफ्तर में वह काम करते थे वह दुनिया का सबसे घटिया वर्क प्लेस था, जहां कुछ नहीं हो सकता, कम से कम उनकी नजर में. कई बार चर्चा हुई तो पूछ पड़ा कौन से विभाग में हैं?
‘मीडिया में.’ इतनी ही काफी था. सबसे अच्छी बात यही रही कि वह अपने आप में इतने गूंथे हुए थे कि उन्होंने हमारे बारे में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.
जैसे ही कट प्वायंट मिला, मैंने परीक्षा के बारे में पूछ डाला. बात चली तो हिंदी के पेपर का भी जिक्र आया. मैडम ने इतिहास से एमए कर रखा था. अपनी अच्छी हिंदी होने का उन्होंने दावा भी किया. मगर एक जगह गाड़ी आकर फंस गई थी.
प्रश्न पत्र में चार ऑप्शन थे. जिनमें से एक शब्द की सही वर्तनी को चुनना था. इतना आसान कि बेहद मुश्किल साबित हो रहा था.

(A) आशीर्वाद
(B) आर्शीवाद
(C) आशीर्बाद
(D) आर्शिवाद
[नोट – ये ऑप्शन स्मरण पर आधारित हैं. किसी भी प्रकार की त्रुटि की हमारी कोई जिम्मदारी नहीं है. धन्यवाद]

महोदया ने इनमें से ऑप्शन (B) को सेलेक्ट किया था. मुझे काफी ताज्जुब हुआ, उनके दावे पर नहीं बल्कि समझ पर.
सफाई में उनका कहना था कि वह कन्फ्यूज हो गई थीं. बार बार उनकी आंखों के सामने बाजारों में पसरे बोर्ड प्रकट हो जा रहे थे. हर तरफ उन्हें ‘आर्शीवाद’ ही नजर आ रहा था. शायद केबीसी की तर्ज पर उन्होंने ऑडिएंस के साथ जाने का फैसला किया – और भीड़ में शामिल हो गईं.

रुख़सत

उनसे कहीं ज्यादा इस बात से मैं दुखी था. कई दिनों तक बात तीर की तरह चुभ रही थी.
कुछ करना चाहिए. वैसे भी साल में एक दिन सरकारी खर्चे पर हवाई सफर के बाद कुछ विद्वान कहीं न कहीं जुटते ही हैं. कुछ न कुछ बड़ी सलाह देते भी होंगे. कुछ बड़े काम हिंदी के लिए या उसके नाम पर होते भी होंगे.
कुछ छोटे काम रह ही जाते हैं. इन पर बड़े मकसदवालों का ध्यान नहीं जाता. लगा नहीं – कुछ तो करना ही होगा.
‘अक्षरश:’
मन में सबसे पहले यही शब्द आया. इधर उधर घूमने के बाद भी फर्स्ट इम्प्रेशन ही लास्ट लगा. यह बात भी दो हफ्ते पुरानी है. एक पत्रकार मित्र ने अपनी ऐसी ही तकलीफें शेयर की. वह अपनी टीम से परेशान थे. ‘इन लोगों को इतने साल काम करते हो गए. लेकिन कार्यवाही लिखना नहीं सीखा.’
आगे बोले, ‘बात इतनी ही रहती तो उतना नहीं खलता. बार बार बताया कि प्रोसीडिंग के लिए – कार्यवाही – और एक्शन के लिए – कार्रवाई – लिखना है. वे वाकई बड़े स्मार्ट हैं. उन्होंने एक नया ही शब्द गढ़ डाला – कार्यवाई. कर लो जो करना हो.’
‘बेहयाई की हद तो देखिए – कहते हैं सब – मैंने तो लिख दिया, सर आप ही सुधार लो.’
 हालांकि ‘अक्षरश:’ का टारगेट ऑडिएंस फिलहाल अलग है. हमारा प्रयास है पहले उन्हें इस बात के लिए राजी किया जाए जो विदाउट फेल ‘आर्शीवाद’ लिखते चले जा रहे हैं.
इसी कोशिश के तहत फेसबुक पर एक पेज बनाया है, ताकि बात बढ़े और सविनय निवेदन के साथ उन तक पहुंचे. पता नीचे है, जब वक्त मिले लाइक कर लें. कुछ और वक्त मिले तो दूसरों – खासतौर पर उन्हें जिन्हें इसकी ज्यादा जरूरत है – बताएं. और जब फुर्सत में हों तो कुछ आप भी कंट्रीब्यूट करें, मेहरबानी होगी.
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