कहीं आप भी उन्हीं जैसे तो नहीं?

राजनीति की फिंजा में आप की खुशबू है। ये अच्छा है लोकतंत्र के ज़िंदा रहने के लिए, साँस लेने के लिए। जिस सडांध भरी व्यवस्था में हम रह रहे थे उसमें केजरीवाल का आना एक ताज़ी हवा के झोंके जैसा था। पर कई बार शक होता है क्योंकि हम इतने बार ठगे गए हैं कि अब तो ठगी पर भी विश्वास नहीं रहा। शक की वजहें हैं।
सत्ता का अपना एक चरित्र होता है। सत्ता आपको भ्रष्ट करती है, आँखें मूँदने को विवश करती है। फ़ैसले के समय धृतराष्ट्र बनाती है। गांधी होना मुश्किल नहीं नामुकिकन है। बानगी छोटी है पर समझ के लिए काफ़ी है। पारंपरिक राजनैतिक पार्टियाँ जनता को केवल चुनाव के समय दबाये जाने वाला ईवीएम बटन समझती हैं। सामान्य दिनों में न नेता जनता से मिलता है न ही उनका कोई काम करता है जब तक आप उनके कार्यकर्ता न हों वो भी काम तब होता है जब नेता को आपसे कोई फ़ायदा दिख रहा हो यानि वहाँ भी दोतरफ़ा सौदेबाज़ी की संभावना देखने के बाद ही काम होता है।
यानि कुल मिलाकर सामान्य जनता, सामान्य कार्यकर्ता से मिलने का कोई मज़बूत तंत्र 50 साल बाद भी सरकारें या राजनैतिक पार्टियाँ विकसित नहीं कर पाई हैं। दिखावे के लिए कई राज्यों में मुख्यमंत्री दरबार लगता है पर होता जाता उन्हीं का है जिनके पास कोई न कोई कुंजी हो।
व्यवस्था बदलने के नारे के साथ आई अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के पास भी अब तक इसका कोई उत्तर नहीं है। बल्कि यहाँ हालात और बदतर हैं। आंदोलन से उपजी पार्टी के नेताओं के फ़ोन पर ईएपीबीएक्स लग गया है।
विनोद कुमार बिन्नी सबसे अनुभवी होते हुए भी सत्ता लोलुप थे तो सोमनाथ भारती क्या थे? जिस सीमा तक आपने भारती का समर्थन किया, अपनी ग़लती होने पर भी मानने से इंकार करते रहे वो किस नैतिकता के मापदंड पर सही उतरता है? एक पूर्व महिला राजनयिक को अपनी बात कहते समय जिस तरीक़े से माइक हटा कर धक्कामुक्की की गई क्या वो आंतरिक लोकतंत्र था? इतनी निरंकुशता तो बीजेपी और कांग्रेस में भी नहीं है। दो सिपाहियों के तबादले के लिए पूरी दिल्ली को अव्यवस्थित कर देना कहाँ की लोकनीति थी?
आप क्या बात करना चाहते हैं? क्यों बात करना चाहते हैं? हिन्दी में बात करना चाहते हैं तो एक दबाएँ, अंग्रेज़ी में बात करना चाहते हैं तो दो दबाएँ। आप नंबर दबाते रहें अंत में अपना संदेश रिकॉर्ड कराएँ हम पलटकर फ़ोन करेंगे पर वो फ़ोन कभी आता नहीं। मानो एयरटेल के कॉल सेंटर पर अपना फ़ोन रिकॉर्ड करा रहे हों
अरे भाई साहब नंबर दबाते रहने के लिए जनता ने आप पर विश्वास थोड़े ही किया था। आप भी सत्ता हो जाएँगे वो भी बहुत कम दिनों में ये तो उम्मीद नहीं थी। माना आपके पास बिल्कुल फुर्सत नहीं है। चुनाव सामने है फ़सल काटनी है। देश भर से लोग आपसे जुड़ना चाहते हैं। लोग दो दिन, तीन दिन चल कर सुदूर गाँव से दिल्ली मिलने पहुँचते हैं और आप के सामान्य से ख़ास बने नेता उन्हें टका सा ज़बाब दे देते हैं। उनमें वो गर्माहट नहीं दिखती, चेहरे पर मक्कारपन दिखता है तो बेचारा आम आदमी निराश होकर लुटा-पिटा भाव लेकर वापस घर पहुँचता है।
अरे भाई कुछ दे नहीं सकते तो गर्माहट, मुस्कुराहट तो दे ही सकते हो। या क्या उसके लिए भी संविधान बदलना होगा? और यही तो आपकी चुनौती भी थी। आपके भी निजी सहायक सत्ता के स्वयंभू बन गए हैं। वॉलंटियर से सफ़र शुरू कर वो भी व्यवस्था के सरकारी पीए में तेज़ी से तब्दील हो रहे हैं। उनमें भी वो चालाकियाँ आ गई हैं जिनसे जनता नफ़रत करती थी। हम जानते हैं कि ये लोकव्यवहार की छोटी चीज़ें हैं और आपका ध्यान बड़े लक्ष्य पर है। पर भष्ट् होने की शुरुआत अक्सरहाँ छोटी चीज़ों से ही होती है।
चलिये बड़ी चीज़ों पर आते हैं। जिस हाईकमान सिस्टम की आलोचना कर आप पूरे देश में स्वराज की परिकल्पना लागू करना चाहते हैं उस पार्टी में ख़ुद लोकतंत्र नहीं है। विनोद कुमार बिन्नी सबसे अनुभवी होते हुए भी सत्ता लोलुप थे तो सोमनाथ भारती क्या थे? जिस सीमा तक आपने भारती का समर्थन किया, अपनी ग़लती होने पर भी मानने से इंकार करते रहे वो किस नैतिकता के मापदंड पर सही उतरता है? एक पूर्व महिला राजनयिक को अपनी बात कहते समय जिस तरीक़े से माइक हटा कर धक्कामुक्की की गई क्या वो आंतरिक लोकतंत्र था? इतनी निरंकुशता तो बीजेपी और कांग्रेस में भी नहीं है। दो सिपाहियों के तबादले के लिए पूरी दिल्ली को अव्यवस्थित कर देना कहाँ की लोकनीति थी?
भ्रष्ट लोगों की अराजक, तालिबानी सूची निकालना किस व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई है? जो भ्रष्ट है या जिन पर जाँच चल रही है या न्यायालय ने प्रतिकूल टिप्पणियाँ की है उन पर हमला तो जायज़ है पर केवल शोर मचाने के लिए, सूची लंबी करने के लिए या सेक्युलर दिखने के लिए राजनीति के उन्हीं हथकंडों का इस्तेमाल करना उम्मीद को नाउम्मीदी में तब्दील करता है।
राजनाथ सिंह, कपिल सिब्बल, नरेंद्र मोदी पर कहाँ किस अदालत, एजेंसी ने भष्ट्राचार के आरोप लगाए हैं? अगर सबूत है तो आपको सबूत के साथ आरोप लगाने थे? बिना सबूत, तथ्य के तो आप की पार्टी पर भी तमाम आरोप लग सकते हैं? आप ट्रांसपेरेसी इंटनेशनल थोड़े ही हैं? या डेसमंड टूटू की ट्रूथ कमीशन हैं?
आपके लिए खाप समाजिक वास्तविकता है। राजनैतिक अराजक व्यवहार आपके परिवर्तन की लड़ाई है। जिम्मेदारियों से भागना, गवर्नेंस के मुद्दे पर दाएँ बाएँ देखना नाउम्मीदी की तरफ़ ले जाता है। भले ही आप कितने ही ईमानदार क्यों न हों?
ईमानदार तो मोरारजी भाई देसाई भी थे। पर उम्मीदों और आंकाक्षाओं पर बहुमत के बाद भी खरे नहीं उतर सके और सरकार गिर गई। यही हाल वीपी सिंह का रहा। वीपी सिंह की लहर आपसे बड़ी थी केजरीवाल जी, लेकिन क्या हुआ वीपी सिंह का सब जानते हैं। इतिहास लिखने बैठे हैं अच्छी बात है पर लिखे इतिहास से सबक़ भी लीजिये, नहीं तो ख़ुद इतिहास हो जाएँगे। माना अभी निचले तबके, झुग्गी झोपड़ी, विस्थापित, वंचित लोगों के बीच आप हीरो हैं। पर जिस मध्यम वर्ग के आप दिल्ली में हीरो बने थे उसका विश्वास टूटा है।
हालाँकि केजरीवाल ख़ुद भी चालाकी से अपने जनाधार को अविश्सनीय मध्यम वर्ग से झुग्गी झोपड़ी के विश्वसनीय जनाधार की तरफ़ शिफ़्ट कर रहे हैं क्योंकि केजरीवाल को लगता है मध्यम वर्ग मोदी को वोट करेगा। वैसे भी मध्यम वर्ग कभी विश्वसनीय वोट बैंक नहीं रहा है। कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी में यात्रा करता रहा है। इसलिए मध्यम वर्ग की नाराज़गी झेलते हुए भी कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक को शिफ़्ट करने की रणनीति पर केजरीवाल काम कर रहे हैं। पर आप को भूलना नहीं चाहिये कांग्रेस के ख़िलाफ आंदोलन का नेतृत्व मध्यम वर्ग ही कर रहा है। पर सवाल यही है कि कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे आप का कांग्रेसीकरण कितना जल्द होगा? या इतिहास में दर्ज कराने लायक उपलब्धि पाने में केजरीवाल कामयाब होंगे और ख़ासकर राजनीति, सरकार, व्यवस्था में आस्था खो चुके लोगों को इस बार भी धोखा मिलेगा??
# शंकर अर्निमेष [लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं । ये उनके निजी विचार हैं]

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