इतिहास के घुमावदार रास्ते

हम इतिहास के एक ऐसे मोड़ पर खड़े है जहां सब का चुनावी महाज्ञान गड़बड़ा गया है.
बड़े बड़े चुनावी पंडित समझ नहीं पा रहे कि अगले चार महीने में क्या होगा? पार्टियां नहीं समझ पा रहीं कि चुनावी रणनीति किसको लक्ष्य कर बनाए जाएं? राहुल गांधी को ध्यान में रखकर - या मोदी को ध्यान में रखकर - या फिर केजरीवाल को ध्यान में रखकर?
पंडितों को समझ नहीं आ रहा कि नई पार्टी आप कितनी सीटों पर नुक़सान करेगी - और कितनी पर जीत हासिल करेगी?
केजरीवाल कोई और भी बन सकता था, किरण बेदी भी बन सकती थीं. कम से कम उनका क़द और ख्याति केजरीवाल से बड़ी थी पर उनकी नियत साफ नहीं थी. बन तो राहुल गांधी भी सकते थे पर सत्ता विवशता थी सो मौक़ा चूक गए. कोई व्यवस्था को बदलने के लिए जुड़ रहा तो कोई नई व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए. किसी ने जे पी आंदोलन नहीं देखा तो किसी ने आज़ादी का आंदोलन नहीं देखा. सो पहले अन्ना का आंदोलन, फिर केजरीवाल की आप में शामिल होना आज़ादी के तीसरे आंदोलन में शामिल होने जैसा है.
कांग्रेस में तो अद्भुत मतिभ्रम की स्थिति है. ज़्यादातर कांग्रेसी नेता मान चुके हैं कांग्रेस सत्ता में नहीं आने वाली, इसलिए चुनाव से पहले बाद की रणनीति बना लेनी चाहिए. कहीं उसमें भी देर न हो जाए और कभी न बनने वाला तीसरा मोर्चा इस बार बन जाए.
जयराम रमेश और दिग्विजय सिंह चुनाव बाद रणनीति पर काम करना चाहते हैं. इसलिए राहुल गांधी की ताजपोशी के कट्टर समर्थक दिग्विजय ने अचानक गाड़ी बैकग्राउंड में डाल चुनाव बाद नेतृत्व चुनने की वकालत शुरू कर दी है, लेकिन नए और पुराने घाघ कांग्रेसियों का एक वर्ग मानता है अभी हार मानना जल्दबाज़ी होगी और राहुल गांधी की रीब्रांडिग कर या प्रियंका को उतारकर पंक्चर गाड़ी को धक्का लगाया जाए. मरम्मत करते रहा जाए – और सरकार न बनने पर आप का लिफ़्ट लिया जाए.
बीजेपी कांग्रेस से थोड़ा कम कन्फ़्यूज्ड है. बीजेपी को ये तो पता चल गया है कि मर्ज़ क्या है, पर इलाज नहीं मिल रहा. वो कांग्रेस को छोड़कर आप पर आक्रमण कर रहे हैं. कभी न लिखने वाले जेटली जी केजरीवाल की शासकीय क्षमता पर ब्लाग लिख रहे हैं. खुद मोदी को भी मैदान में उतरना पड़ा है. मोदी को केजरीवाल के कुछ एजेंडों पर निर्मम प्रहार करने से नहीं चूकना चाहिये. प्रशासनिक अक्षमता पर निरंतर प्रहार, थके हारे बिना विश्वसनीयता वाले चेहरों को हटा कर और विश्वसनीय, अच्छे चेहरों को टिकट बांटकर ही मोदी तेज़ी से फिसलती बाज़ी को थाम सकते हैं. बेहतर, नई सोच का एजेंडा ही बीजेपी को बचा सकता है. इसलिए विजय गोयल और डॉक्टर हर्षवर्धन को कहा गया कि छोटी से छोटी ग़लती पर हमले कर उन्हें दिल्ली में घेरा जाए. यानि 7 गंवा कर 30-35 सीटें बचाई जाएं.
बाक़ी पार्टियाँ अभी तक उतनी डरी हुई नहीं है जितनी बीजेपी और कांग्रेस. क्षेत्रीय पार्टियों को लगता है कि ये लपटें अभी उन तक नहीं पहुंच पाएंगी.
भारत के मतदाता वैसे तो काफ़ी बुद्धिमान है पर इस बार उनके सामने भी कम असमंजस नहीं है वो ईमानदार, भष्ट्राचार मिटाने का सपना दिखाने वाले केजरीवाल को चुनें या तरक़्क़ी और रोज़गार का सपना दिखाने वाले मोदी को. अजीब कश्मकश है और इस चक्कर में कोई तीसरा न जीत जाए. ये सारे सवाल आम आदमी को मथ रहे हैं. लेकिन शहरी मध्यम वर्ग के मतदाताओं के मन को मथने में केजरीवाल ने अभूतपूर्व सफलता पाई है जो अब तक मोदी की ताक़त थी. अगर केजरीवाल 200 शहरी सीटों को केन्द्रित कर अच्छे उम्मीदवार उतारें, तो  25 प्रतिशत की स्ट्राइक रेट भी आप को बीजेपी, कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी बनाती है. ध्यान रखें - बाक़ी सब क्षेत्रीय पार्टी होंगी. कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए 140 सीटें चाहिए, मोदी को 200 – पर केजरीवाल को मात्र 35-40 सीटें.
पत्रकार, समाज के बुद्धिजीवी भी असंमंजस में हैं. उन्हें भी समझ नहीं आ रहा किसका पक्ष लें और किसके विपक्ष में रहें. कांग्रेस वाले बीजेपी की भाषा बोल रहे हैं. बीजेपी वाले भी डगमगा रहे हैं. फिजां में आप की लहर है. आप आज़ादी की तीसरी जंग साबित हो रही है. सबके अपने तर्क हैं, अपनी आस्थाएं हैं.
कोई ऐसा है जो अरविंद केजरीवाल की सादगी पर मोहित होकर जुड़ रहा है. लेकिन सादगी तो कम्युनिस्ट पार्टी के सभी नेताओं में रही है. उस सादगी पर अपने कालखंड में उन्हें जनता का विश्वास भी मिला पर वे जड़ हो गए. समय के हिसाब से लोगों की आंकाक्षाओं पर खरे नहीं उतरे, इसलिए सिमट गए.
कोई अरविंद की ईमानदारी पर लट्टू होकर जुड़ रहा है. 125 करोड़ के देश में अरविंद के अलावा भी ईमानदार लोग हैं, पर परिस्थितियों का नेतृत्व केजरीवाल और अन्ना ने किया. अन्ना फिसले पर केजरीवाल अडिग रहे.
केजरीवाल कोई और भी बन सकता था, किरण बेदी भी बन सकती थीं. कम से कम उनका क़द और ख्याति केजरीवाल से बड़ी थी पर उनकी नियत साफ नहीं थी.
बन तो राहुल गांधी भी सकते थे पर सत्ता विवशता थी सो मौक़ा चूक गए. कोई व्यवस्था को बदलने के लिए जुड़ रहा तो कोई नई व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए. किसी ने जे पी आंदोलन नहीं देखा तो किसी ने आज़ादी का आंदोलन नहीं देखा. सो पहले अन्ना का आंदोलन, फिर केजरीवाल की आप में शामिल होना आज़ादी के तीसरे आंदोलन में शामिल होने जैसा है.
आप में शामिल होना इस मौसम का फ़ैशन भी है और पैशन भी. आप से जुड़ रहे हैं तो व्यवस्था के साथ नहीं तो खिलाफ.
कई बार क्रांति अच्छे के लिए होती है, कई बार बुरे के लिए - पर दोनों ही स्थितियों में तटस्थता नीरो की तरह बाँसुरी बजाने से कम नहीं.
 # शंकर अर्निमेष [लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं । ये उनके निजी विचार हैं]

No comments:

Post a Comment

आपके विचार बहुमूल्य हैं. अपनी बात जरूर रखें: