केजरीवाल ने क्यों पलटी मारी?

अचानक से केजरीवाल ने स्क्रिप्ट पलट दी। शासन पर घिर रहे थे सो अपने पुराने एजेंडें पर वापस आ गए। आंदोलन ने केजरीवाल को सत्ता तक पहुँचाया था, उन्हें लगा था सत्ता के ज़रिए वे वायदों को पूरा कर देश भर के लोगों ख़ासकर मोदी के वोटबैंक में सेंध लगा सकते हैं पर उन्हें यह अहसास कुछ दिनों में हो गया कि सुशासन के एजेंडे के ज़रिये वो मोदी को बहुत ज़्यादा नुक़सान नहीं पहुँचा पाएंगे क्योंकि मोदी के पास साबित किया हुआ फ़ार्मूला है। न केवल मोदी के पास बल्कि शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह भी इस मापदंड पर उन पर भारी पडेंगे।
जनता दरबार पर हुआ भसड़ इसकी बानगी थी। नौसिखिएपन की हद ही थी। किसी मंत्री को शासन का अनुभव नहीं था। सोमनाथ भारती कभी न्यायाधीशों की बैठक बुला रहे थे तो कभी विदेशी महिलाओं की कैविटी सर्च कर रहे थे। इन घटनाओं के बाद केजरीवाल समझ रहे थे कि शासन उनका कप आफ टी नहीं है कम से कम अभी तो कतई नहीं जब लोकसभा चुनाव की अधिसूचना की तलवार सामने लटक रही हो और समय चुक रहा हो। जब लोकसभा की बड़ी स्क्रिप्ट लिखने की पूरी संभावना सामने खड़ी हो जो तात्कालिक रूप में केवल आंदोलन से पूरा हो सकता है तो उस मौके को क्यों छोड़ा जाए।
कांग्रेस स्पेस लगातार खाली कर रही थी। मोदी आकांक्षाओं की राजनीति कर और सपने बेचकर पहले स्थान पर काबिज हैं पर खाली पड़े दूसरे स्थान पर केजरीवाल अपना स्थान बना सकते हैं। सो केजरीवाल शासन के एजेंडे से हटकर असली गणतंत्र, सुराज हासिल करने के एजेंडे पर आ गए।
पूरी सड़ी गली व्यवस्था को बदलना है तो आंदोलन करना ही पड़ेगा। व्यवस्था बदलने के लिए अराजक होना पड़ता है और हर व्यवस्था बदलने से पहले अराजक होती है। चाहे मार्क्सवाद के बाद की व्यवस्था हो या पूँजीवाद से पहले की। आज़ादी के आंदोलन का समय हो या ग़ुलामी का समयकाल। अराजकता से ही नई व्यवस्था जन्म लेती है, पुरानी ख़त्म होती है। केजरीवाल की व्यवस्था परिवर्तन की ये लड़ाई लोकसभा की स्क्रिप्ट के लिए ज़रूरी थी - और आप के अखिल भारतीय अभ्युदय के लिए भी।
इसलिए केजरीवाल ने आर पार की लड़ाई छेड़ने का निर्णय लिया। एजेंडा ऐसी स्थितियाँ पैदा कर देने की है ताकि वो सरकार की क़ुर्बानी दे सकें, कांग्रेस को मजबूरन समर्थन वापस लेना पड़े और वो शहीद बनकर जनता के बीच लोकसभा में जा सकें।
इतिहास में ऐसे कम ही मौके आए हैं जब सरकार अपनी ही व्यवस्था के ख़िलाफ़ सड़क पर आ गई हो। पश्चिम बंगाल में दो बार ऐसे मौक़े आए हैं एक बार 1967 में और दूसरी बार तब राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी को नंद्रीग्राम की हिंसा के विरुद्ध राजभवन में धरने पर बैठना पड़ा था पर ये सांकेतिक था।
वैसे भी अगले 15 दिन में वो शासन के चमत्कार से देश भर में 50-60 या 100 सीट जीतने की स्थिति में नहीं हैं। इसलिए लगातार व्यवस्था और सरकार से टकराकर, टीवी स्पेस से मोदी को हटाकर कम संसाधन और कम समय में बड़ा परिवर्तन कर सकने की स्क्रिप्ट तैयार की गई। अगले 15 दिनों में लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लग जानी है और केजरीवाल के संपूर्ण वायदा पूर्ति या संपूर्ण परिवर्तन के लिए पंद्रह दिन ही बचे थे जिसको लेकर वो आम चुनाव के रणक्षेत्र में जाकर इस ऐतिहासिक मौक़े का ऐतिहासिक फ़ायदा उठा पाते जो कतई गवर्नेंस से संभव नहीं था।
इतिहास में ऐसे कम ही मौके आए हैं जब सरकार अपनी ही व्यवस्था के ख़िलाफ़ सड़क पर आ गई हो। पश्चिम बंगाल में दो बार ऐसे मौक़े आए हैं एक बार 1967 में और दूसरी बार तब राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी को नंद्रीग्राम की हिंसा के विरुद्ध राजभवन में धरने पर बैठना पड़ा था पर ये सांकेतिक था।
दो पुलिसवालों को निलंबित कराने के मामूली से फ़ैसले को पूर्ण गणतंत्र की लडाई में तब्दील करने का अद्भुत उच्श्रृंखलता नहीं।
केजरीवाल धरने पर बैठे थे दो पुलिसवालों के तबादले को लेकर, लेकिन बैठते ही उनका छोटा एजेंडा बड़ा हो गया और उसका संदेश भी। तबादले की जगह पुलिस पर पूर्ण नियंत्रण और खोखले गणतंत्र की विदाई के लिए राजपथ पर झाँकी उनकी उनकी प्राथमिकता हो गई। आगे वो कांग्रेस के मंत्रियों पर केस दर्ज कर, लोकपाल पारित कराने जैसी स्थितियाँ निर्मित करें जहाँ किसी बड़े एजेंडे से वो हट सकें।
दिलचस्प ये है कि कांग्रेस इस खेल में बड़े ही दिलचस्प ढंग से पत्ते खेल रही है। केजरीवाल अपनी रणनीति के हिसाब से सरकार क़ुर्बान करने की रणनीति पर चल रहे हैं। जितना बड़ा केजरीवाल का क़द होगा मोदी को संख्या का उतना ही टोटा होगा।
क्या मैच फ़िक्स है या सब परिस्थितियों के साथी हैं? कांग्रेस समर्थन वापसी की भाषा बोल रही है यही तो केजरीवाल की भी मंशा है।
# शंकर अर्निमेष [लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं । ये उनके निजी विचार हैं]

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