क्या करें मोदी?

आम आदमी पार्टी की अवधारणा ने राजनीति के सारे समीकरणों को उलट पलट दिया है. लोकसभा की राजनैतिक पटकथा निर्देशकों के हिसाब से सही चल रही थी. मोदी विमर्श के सारे प्लेटफ़ार्म का मंझे हुए खिलाड़ी की तरह सही टाइमिंग के साथ इस्तेमाल करते हुए अश्वमेध घोड़े पर सरपट दौड़े जा रहे थे.
केजरीवाल के पास व्यक्तिगत विश्वसनीयता है जिसे वो संस्थागत रूप देने की कोशिश कर रहें हैं. कोई उन्हें चोर मानने को तैयार नहीं, कम से कम आज तो नहीं. विश्वसनीयता के साथ केजरीवाल के पास भष्ट्राचार के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने वाले मज़बूत योद्धा की मज़बूत छवि है. केजरीवाल के पास ग़ैर पारंपरिक तरीक़े से सोचने वाले युवाओं की फ़ौज है, लेकिन उनके पास 200 सीटों पर मज़बूत संगठन, भविष्य का राष्ट्रीय एजेंडा नहीं है.
मोदी की जय जयकार हो रही थी. लाखों की भीड़ मोदी को सुन रही थी, समझ रही थी. मज़बूत नेतृत्व, मंहगाई, नौकरियों के जाने से सहमे भारत को दिलाया दे रहा था 'मैं हूँ ना'.
राजनीति का कृष आ चुका था. लोग आशा भरी नज़रों से उसके आने की धमक महसूस कर रहे थे. सेंसेक्स ऊपर चढ़ रहा था. उद्योगपति मान चुके थे उन्हें बचानेवाला आ चुका है.
एक अंडर करेंन्ट चल रहा थी. कांग्रेस हाँफ रही थी. ख़ुद कांग्रेस मान चुकी थी कि उसके पास कोई अस्त्र नहीं जिससे मोदी के रथ को रोका जा सके. वे 80-85 पर संतोष करने को तैयार हो गए थे और बीजेपी को रोकने के लिए चंद्रशेखर फ़ार्मूले पर विचार चल रहा था. कांग्रेसी पत्रकार विनोद शर्मा और मेहता भी कांग्रेस के 80 पर संतोष कर चुके थे.
अचानक नायक की एंट्री होती है - और सारे समीकरण उलट पुलट जाते हैं. कांग्रेसी कैम्प में उम्मीद की किरणें जगती हैं. बुझे चेहरों पर मुस्कुराहट आती है. कांग्रेस को नायक मिल जाता है वो उसके अपने युवराज राहुल गांधी नहीं बल्कि उधार के केजरीवाल है.
कांग्रेस गेम में वापस लौटने लगी है. मोदी के अश्वमेधी घोड़ों को रोकने के लिए केजरीवाल सामने हैं.
बीजेपी की सारी रणनीति उलट पुलट चुकी है. बीजेपी को समझ नहीं आ रहा कि केजरीवाल की काट क्या हो? केवल उनके ग़लती करने का इंतज़ार करें. और वो तीन महीने ग़लती न करें तो? जनता पार्टी तीन हफ़्तों में बनी थी और 77 में कांग्रेस का खात्मा कर दिया था. ऐसा ऐतिहासिक मौक़ा दुबारा नहीं मिलेगा.
चिंतन जारी है और बीजेपी के चाणक्य जेटली भी मान रहे हैं - ये नए तरह का चुनाव होने जा रहा है.
सारे डिस्कोर्स के प्लेटफ़ार्म पर केजरीवाल हैं. टेलिविजन उन्हें दूर दराज़ के मतदाताओं तक पहुँचा रहा है. प्रयोग में नयापन है और एजेंडा और विश्वसनीयता मध्यम वर्ग को खींच रहा है फिर बीजेपी क्या करे? पिटे पिटाए तौर तरीक़े से इस नई राजनीति का मुक़ाबला करे या कांग्रेस की तरह इंतज़ार?
अभी तक तो बीजेपी नेता पिटे पिटाए तौर तरीक़े से केजरीवाल को पंक्चर करने में लगे हैं. दिल्ली में बीजेपी की विधानसभा की रणनीति और हर्षवर्धन का भाषण उसकी बानगी थी.
बीजेपी को समझना होगा कि उसके पास क्या है जो केजरीवाल के पास नहीं है तभी वो इस खेल में बढ़त बना पाएगी.
बीजेपी के रणनीतिकारों को समझना होगा इस चुनाव का सेंट्रल थीम, जो मोटे तौर पर चार हैं - भष्ट्राचार, मंहगाई, बदहाल अर्थव्यवस्था और विश्वसनीयता का संकट.
भष्ट्राचार का  परसेप्शन, मंहगाई और पॉलिसी पारालिसिस से बदहाल अर्थव्यवस्था का इम्पैक्ट मध्यम वर्ग हो या उच्चवर्ग या क़तार का अंतिम व्यक्ति तक पहुँचा है - और वो इस व्यवस्था को बदलने को आतुर है.
केजरीवाल के पास व्यक्तिगत विश्वसनीयता है जिसे वो संस्थागत रूप देने की कोशिश कर रहें हैं. कोई उन्हें चोर मानने को तैयार नहीं, कम से कम आज तो नहीं. विश्वसनीयता के साथ केजरीवाल के पास भष्ट्राचार के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने वाले मज़बूत योद्धा की मज़बूत छवि है. केजरीवाल के पास ग़ैर पारंपरिक तरीक़े से सोचने वाले युवाओं की फ़ौज है, लेकिन उनके पास 200 सीटों पर मज़बूत संगठन, भविष्य का राष्ट्रीय एजेंडा नहीं है.
हालाँकि, कई बार एक मुद्दा का लहर भी सरकार बनाने, बिगाड़ने के लिए काफ़ी होता है.
मोदी के पास अपना करिश्मा, सुशासन का ट्रैक रिकार्ड, मज़बूत नेतृत्व की छवि, विश्वसनीयता है पर उनकी पार्टी के सोचने का ढंग अब भी उस टक्कर का नहीं है. उनकी विश्वसनीयता तो है पर उम्मीदवारों की विश्वसनीयता उतनी खरी नहीं है.
पहला काम तो बीजेपी को हर क्षेत्र के विश्वसनीय, ईमानदार लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा पार्टी में शामिल कर टिकट देने का काम करना चाहिए. विनेबिलिटी की जगह विश्वसनीयता और ईमानदार छवि पहला मापदंड होना चाहिए.
दूसरा काम अबूझ एजेंडे के साथ नहीं बल्कि पार्टी को भविष्य का एजेंडा या सरकार का एजेंडे पत्र को सिलसिलेवार तरीक़े से मोदी की रैलियों में एक एक कर लाँच करना चाहिये. पुरानी परिपाटी से हटते हुए एक प्रेस कांफ्रेस कर विज़न डाक्यूमेंट पेश कर डस्टबिन में डालने की परंपरा से हट कर सोशल मीडिया और रैलियों के ज़रिये जनता का विश्वास हासिल किया जाए. वाजपेयी सरकार ने दस बड़े ऐतिहासिक काम सत्ता में आने पर किया, उन्हें पहले बता जाए कि 10-20 ऐसे इतिहास रचने वाले काम क्या होंगे? मंहगाई और रोज़गार पैदा करने के लिए ऐतिहासिक विज़न डाक्यूमेंट पेश कर मध्यम वर्ग का खोया विश्वास पाया जा सकता है. यानि सपने दिखाने और उन्हें हक़ीक़त में उतारने का एजेंडा पत्र पर तुरंत बीजेपी कैंपेन को शिफ़्ट करने का काम शुरू हो. मनमोहन सरकार पर हमले जारी रहे, पर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने, हर सेक्टर में बुनियादी परिवर्तन लाने, रोज़गार सृजन, नई सोच, नए आइडिया का पॉजिटिव एजेंडा पेपर के साथ केजरीवाल से बढ़त बनाने की योजना पर बीजेपी को तत्काल काम करना चाहिये वरना मंच कहीं केजरीवाल न लूट ले जाएं और कांग्रेस ताली बजाए.
#शंकर अर्निमेष [लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं । ये उनके निजी विचार हैं]

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