हमारा लोकतंत्र बहुत ख़ूबसूरत है

हमारे आम आदमी पार्टी के समर्थक कई दोस्त सोमनाथ भारती के बचाव में बार-बार यह दलील दे रहे हैं कि मंत्री ने पब्लिक के कहने पर युगांडा की महिलाओं के यहां रेड करवाई। यह हास्यास्पद दलील है। इस बात को कोई कैसे जस्टिफाइ कर सकता है कि पब्लिक के कहने पर कोई मंत्री बिना सबूत किसी महिला की इज़्ज़त उतार दे।
हमारे ऐसे मित्र यह क्यों नहीं समझते कि यह "पब्लिक" नाम की प्राणी भी कम थोड़े ही है। यह पब्लिक ही है, जो आज भी किसी महिला को डायन बताकर जला डालती है। यह पब्लिक ही है, जो आज भी किसी महिला के दूसरे पुरुषों से हंसकर बात कर लेने पर उसे वेश्या करार दे देती है। यह पब्लिक ही है, जो दो लोगों के प्रेम करने पर सज़ा-ए-मौत का फरमान सुना देती है। यह पब्लिक ही है, जो एक मामूली चोरी में पकड़े जाने पर किसी किशोर को पीट-पीटकर मार डालती है और बड़े-बड़े चोरों के आगे-पीछे घूमती है।

भाई साहब, अगर पब्लिक के कहने पर ही सब कुछ करना है, तो अदालतें भंग कर दीजिए, कानून का शासन समाप्त कर दीजिए। हो सकता है कि पब्लिक ने मंत्री से कहा कि फलाने घर में वेश्यावृत्ति चलती है, लेकिन मंत्री को एक्शन लेने से पहले कुछ तो पड़ताल करा लेनी चाहिए थी।
मैंने आम आदमी पार्टी के अपने भाइयों से कुछ सवाल पूछे थे। उनमें से एक भी सवाल का जवाब अब तक तो नहीं आया, लेकिन राष्ट्रप्रेम, क्रांति और नई राजनीति की दुहाई बार-बार ज़रूर दी जा रही है। मैं फिर से कहता हूं कि हमारे ऐसे मित्र मंत्री की इस हरकत को सिर्फ़ इसलिए डिफेंड कर पा रहे हैं, क्योंकि ऐसा उनके साथ नहीं हुआ है। मुझे बताइए कि आपके गांव वालों या मोहल्ले वालों के कहने पर पुलिस आपके घर में बिना पुख्ता आधार रेड कर दे और किसी महिला को उठाकर चली जाए, तो भी आप यही दलील देंगे, जो सोमनाथ भारती के बचाव में दे रहे हैं?
इस देश में कोई अल्पसंख्यक राष्ट्रपति बन जाता है, किसी चाय बेचने वाले का बेटा प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो जाता है, कोई दलित महिला मुख्यमंत्री बन जाती है, लोगों को बराबरी का अधिकार देने के लिए कई तबकों से विरोध के बावजूद बाकायदा आरक्षण की व्यवस्था है। महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में काम कर रही हैं। हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी मिली हुई है। हम धड़ल्ले से अपनी बात बोल सकते हैं, लिख सकते हैं, आंदोलन कर सकते हैं। मंत्री और प्रधानमंत्री को भी हम गालियां दे रहे हैं
यह दुर्भाग्यपू्र्ण है कि अच्छे-भले समझदार लोग भी कई बार जब एक लहर में बहने लगते हैं तो इंसाफ़ की बातें भी उन्हें नाइंसाफी प्रतीत होने लगती है। पुलिस की नाजायज़ कार्यशैली, उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार, वेश्यावृत्ति या ड्रग रैकेट चलते रहने वगैरह का हमने कभी समर्थन किया हो तो बताइए प्लीज।

यह मैं मानता हूं कि कांग्रेस और बीजेपी समेत करीब-करीब तमाम दलों ने जनता को इतनी बुरी तरह निराश और हताश कर दिया है कि आज वो आगा-पीछा कुछ नहीं देख पा रही है। इन सबसे पिंड छुड़ाने के लिए वह किसी अराजकतावादी, तानाशाह, नक्सली अथवा विचारविहीन महत्वाकांक्षी लोगों को भी गले लगाने को तैयार है। यह एक ख़तरनाक स्थिति है।

चार दिन बाद गणतंत्र दिवस है। हम सबको अपने लोकतंत्र और सिस्टम को और ख़ूबसूरत बनाने के लिए अभी काफी काम करने हैं, लेकिन प्लीज़ यह मत कहिए कि भारत को आज़ादी नहीं मिली या भारत आज भी गुलाम है। बहुत सारी अच्छी चीज़ें इन 65 सालों में हुई हैं और बहुत सारी अच्छी चीज़ें हमें अभी करनी हैं।

इस देश में कोई अल्पसंख्यक राष्ट्रपति बन जाता है, किसी चाय बेचने वाले का बेटा प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो जाता है, कोई दलित महिला मुख्यमंत्री बन जाती है, लोगों को बराबरी का अधिकार देने के लिए कई तबकों से विरोध के बावजूद बाकायदा आरक्षण की व्यवस्था है। महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में काम कर रही हैं। हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी मिली हुई है। हम धड़ल्ले से अपनी बात बोल सकते हैं, लिख सकते हैं, आंदोलन कर सकते हैं। मंत्री और प्रधानमंत्री को भी हम गालियां दे रहे हैं और यह लोकतंत्र हमारा अनादर नहीं कर रहा, यह सब आपको कम बड़ी आज़ादी लगती है क्या?

मैं यह मानता हूं कि हमारा लोकतंत्र बहुत ख़ूबसूरत है, लेकिन इसे अभी और ख़ूबसूरत बनाना है। राजनीतिक दलों को सुधरने के लिए ज़रूर बाध्य करना है, क्योंकि बहुत सारी दिक्कतें आज बेशक उन्हीं की वजह से हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम एक और अराजक राजनीतिक दल खड़ा कर लें। मुझे माफ़ करिए, लोकतंत्र में अगाध आस्था रखने की वजह से मैं एक हज़ार और राजनीतिक दलों का स्वागत कर सकता हूं, लेकिन एक भी अराजक राजनीतिक दल का स्वागत नहीं करूंगा। आख़िर हम ख़ूबसूरत बनना चाहते हैं या और बदसूरत बनना चाहते हैं?

# अभिरंजन कुमार [लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं । ये उनके निजी विचार हैं]

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