हड्डियों में छिपा लीजिए दर्द और इस 'गनतंत्र' को सलामी दीजिए

बिहार में अगर आपको "गणतंत्र" किसी चौक-चौराहे पर दिखाई दे जाए, तो मुझे सूचना ज़रूर दे दीजिएगा। और अगर न दिखे, तो अब तो दोस्तो सुशासन बाबू की नीली रोशनियों के नीचे "गणतंत्र की तलाश" वाले कुछ पोस्टर लगा दो, ताकि लोगों को ठीक से पढ़ने में आ सके और किसी को अंधेरे का बहाना न रहे।
मुझे तो पता चला है कि गणतंत्र दिवस के दिन लोग बिहार में "गणतंत्र" को ढूंढ़ते रहे और "गनतंत्र" प्रकट हो गया, वो भी सीधे राजधानी पटना में, उन सब लोगों की नाक के ठीक नीचे, जिनकी नाक "नाक" मानी जाती है।
यहां दो गुटों ने "साक्षात् गन" और "लापता तंत्र" का बखूबी इस्तेमाल करते हुए दिन-दहाड़े कई राउंड फायरिंग की और कंकड़बाग थाने और जक्कनपुर थाने की हमारी प्यारी-दुलारी-लाड़ली पुलिस "गणतंत्र दिवस" के दिन इस "गनतंत्र" की जलेबियां खाती रही।
वैसे बिहार में इस "गनतंत्र" के कम से कम सात आयाम हैं-
बिहार में सिर्फ़ एक ही मुद्दे पर आंदोलन की इजाज़त है और वो है विशेष राज्य के दर्जे पर आंदोलन की इजाज़त।
1. गुंडों का अपना गनतंत्र
2. पुलिस का अपना गनतंत्र
3. गुंडों के संरक्षण में पुलिस का गनतंत्र
4. पुलिस के संरक्षण में गुंडों का गनतंत्र
5. प्रमुख राजनीतिक दलों के वे माननीय, जो पुलिस भी नहीं हैं और अब गुंडे भी नहीं कहलाते- उनका अपना गनतंत्र।
6. प्रमुख राजनीतिक दलों के उपरोक्त माननीयों के संरक्षण में पुलिस का गनतंत्र।
7. नक्सलियों और माओवादियों का गनतंत्र।
मज़ेदार बात यह है कि आदरणीय नीतीश बाबू के इस महान गनतंत्र, जिसे मुख्यमंत्री कार्यालय ने "सुशासन" की मानद उपाधि से विभूषित किया है, और जिसे राज्यसभा सीट उपासक अखबार मालिकों और संपादकों (आम पत्रकारों ने नहीं) ने स्वर्णाक्षरों में मान्यता प्रदान की है, में "गन" की आवाज़ बुलंद है और "जन" की आवाज़ ख़ामोश है।
बिहार में जनता अपने किसी मुद्दे पर आंदोलन नहीं कर सकती। करेगी, तो पुलिस लाठी या गोली चला देगी, दो-चार-दस-बीस-सौ-पचास घायल हो जाएंगे (हलाक भी हो सकते हैं) और मुमकिन है कि अगले दिन अख़बार में ख़बर भी नहीं छपेगी। बिहार में सिर्फ़ एक ही मुद्दे पर आंदोलन की इजाज़त है और वो है विशेष राज्य के दर्जे पर आंदोलन की इजाज़त।
फारबिसगंज गोलीकांड में दो लोगों को मारने से लेकर पटना में इसी 8 जनवरी (2014) को एआईएसएफ के 100 से ज्यादा छात्रों को लाठीचार्ज में घायल करने तक इस "परम-प्रतापी गनतंत्र" की सैकड़ों अमिट कहानियां हैं, जिसमें "परम-प्रतापी पुलिस" द्वारा छात्रों, शिक्षकों, महिलाओं, बुज़ुर्गों तक सबको मारा व पीटा गया है।
इसके अलावा चाहे खगड़िया में नीतीश बाबू के एक "प्राणरक्षक मसीहा" द्वारा "ग़रीबों के मसीहा" डीजीपी के सामने कार्बाइन भांजने और लाठियां चलाने का मामला हो या मुज़फ्फरपुर में "सुरा-व्यवसायी-असुरों" द्वारा एक वयोवृद्ध पूर्व मंत्री को बीच सड़क पर "पीट-पीटकर मोक्ष दिलाने की कोशिश" का मामला हो- ऐसे अद्वितीय मामलों से बिहार का "गनतंत्र" दिन-प्रतिदन समृद्ध हो रहा है।
तो आइए, हम सब बिहार के निवासी  अपने मुख्यमंत्री के साथ मिलकर इस "गनतंत्र" को हार्दिक सलामी दें और इसकी लाठियों की चोट इस कड़कड़ाती ठंड में हड्डियों के बीच छिपाकर विज्ञापन पढ़ने के लिए अखबारों के ग्राहक बने रहें। ...और "गनतंत्र" की हर चोट पर "सु्शासन-स्पॉन्सर्ड" यह गीत गुनगुनाना न भूलें-
"मेरे भारत के कंठहार।
तुझको शत् शत् वंदन बिहार।
तू वाल्मीकि की रामायण
तू वैशाली का लोकतंत्र..."
वाह! उदित नारायण और साधना सरगम ने क्या गाया है! सुनेंगे तो आप भी झूम उठेंगे। जीवन में कोई दर्द तो रहेगा ही नहीं। यह एक गीत बिहार के हर नागरिक की समस्त समस्याओं के समाधान के लिए रामबाण है। कोई शक?

# अभिरंजन कुमार [लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं । ये उनके निजी विचार हैं]

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