राहुल गांधी के लिए मुफ्त की सलाह

इतिहास ने राहुल गांधी को बार बार मौक़े दिए पर वो हिट एंड रन करते रहे. गुरिल्ला राजनीति करते रहे. या तो वो सीखना नहीं चाहते या पूरी अनिच्छा के साथ उन्हें राजनीति में ढकेल दिया गया है. या वे परिपक्व नहीं हैं क्योंकि उनकी राजनैतिक व्यवहार में कनेक्शन नहीं है. कनेक्ट होते हैं फिर डिसकनेक्ट हो जाते हैं. यूपी बिहार के बिजली की तरह हैं. जैसे बिजली आती है, जाने के लिए...

क्या आप बराक ओबामा से भी बड़े नेता हैं? आप के लिए फ़्री की सलाह है ज़िम्मेदारी को संभालना सीखें. ग़लती होने पर स्वीकारें, दूसरों को बलि का बकरा न बनाएं, क़द्दावर नेताओं की क़द्र करें, जो हैं वही दिखें और लोगों के लिए दरवाज़े खोलें. आपकी सरकार है - नए आइडिया को पुश् करें. कुछ तो ओरिजिनलटी दिखाएं.
अक्सरहां लोग पूछते हैं. राहुल गांधी की दिक़्क़त क्या है? सब कुछ होने के बाद भी वो परफ़ॉर्म क्यों नहीं कर पा रहे?
ये सवाल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद और मौजूं हो गई है कि आख़िर कांग्रेस के इतने बड़े संगठन, अनुभवी नेताओं की फौज, सिंहासन पर दस सालों से बैठी हुई पार्टी, बिना चुनौती का नेतृत्व फिर भी असफलता दर असफलता. क्यों राहुल स्थापित नहीं हो पा रहे? क्या राहुल में करिश्मा नहीं है? क्या वो दबाव तले अनिच्छा की राजनीति कर रहे हैं? हो सकता है इसके कुछ जवाब राहुल गांधी को पता हों जो हम नहीं जानते हों या जो पब्लिक डोमेन में उपलब्ध नहीं हैं. कांग्रेसियों को भी नहीं पता.
तो शुरू करते हैं राहुल गांधी को समझने की कोशिश कुछ उदाहरणों के ज़रिए. शायद राहुल गांधी को ये सब पता हो पर हो सकता है वो बिना किसी परिवर्तन, तब्दीली के स्थापित होना चाहते हों? ये भी एक तस्वीर हो सकती है.
बात यूपी के विधानसभा चुनाव की है जब राहुल की एक ब्रांड इमेज बनाई गई थी. राहुल रूरल टूरिज़्म के ज़रिए भारत की खोज पर निकले थे. दलितों के घर में खाए, पीये, सोए, कलावती के घर तक गए. एक आक्रामक, व्यवस्था से नाराज़, सब कुछ बदल देने वाले युवा विद्रोही की छवि गढ़ी गई जो आम जनता से कनेक्ट करे, उनके दुख दर्द को समझे. सिस्टम में दख़ल देकर उसे राह पर लाए. इसका फ़ायदा यूपी के चुनाव में कांग्रेस को ज़बर्दस्त मिला. मृत संगठन के बाद भी कांग्रेस के 22 सांसद चुनकर संसद पहुंचे. इसमें राहुल के ज़ोरदार, आक्रामक कैंपेन का बड़ा योगदान था, लेकिन उसके बाद राहुल गांधी ग़ायब हो गए.
जब भी राहुल गांधी को सरकार में ज़िम्मेदारी की हिस्सेदारी उठाकर अपनी आक्रामक इमेज को बरक़रार रखने का मौक़ा मिला वे छुप गए. जब यूपीए 2 में भष्ट्राचार की गंगा बह रही थी एंग्री यंग मैन का ग़ुस्सा सड़क पर नहीं उतरा. यानि जहां हीरो की एंट्री होनी थी विलेन को पिटने के लिए वहां उल्टा हो रहा था. हीरो छुपा था, अपनी इज़्ज़त बचा रहा था, विलेन अट्टहास कर रहा था. राहुल चाहते तो दो चार भ्रष्ट मंत्रियों को हटाकर एक मापदंड स्थापित कर सकते थे. पर न ऐसा न हुआ, न किया. जब तक मीडिया, कोर्ट के जवाब में उन्हें बाहर न होना पड़ा हो. अब भी कई मंत्री हैं. सुधारना चाहते हैं. नई तरह की राजनीति करना चाहते है, तो अभी हटा दें, कुछ बिगड़ा नहीं है. पर ऐसा करेंगे नहीं - क्योंकि नीयत और नाटकीयता में फ़र्क होता हैं.
दूसरा उदाहरण तब का है जब पूरा देश अन्ना आंदोलन के समय जंतर मंतर पर बैठा था. आपके सरकार की चूलें हिली थीं पर आपके सिपहसालार इस जोड़ तोड़ में लगे थे कि कैसे आंदोलन की हवा निकाली जाए. कैसे अन्ना को इन्कम टैक्स का नोटिस भेजा जाए. वहां कुछ नहीं मिला तो केजरीवाल को पकड़ा जाए, वहां कुछ नहीं मिला तो रामदेव पर रेड कराया जाए. अन्ना-केजरीवाल को तोड़ा जाए. सब कुछ किया गया सिवा इसके कि राहुल सचमुच नए तरह की राजनीति करना चाहते होते तो सीधे जंतर मंतर जाते, अन्ना को पानी पिलाते और लोकपाल विधेयक लाने का वायदा करते. संसद में उसे पारित करवाते और रातों-रात देश के हीरो बन जाते. पर उसके बाद उनके आधे से ज़्यादा मंत्री हवालात में होते. क्या ये जोखिम राहुल उठा सकते थे? ज़ाहिर है नहीं. फिर आज उन्हें केजरीवाल से सीखने की क्या ज़रूरत है? इतिहास ने राहुल गांधी को बार बार मौक़े दिए पर वो हिट एंड रन करते रहे. गुरिल्ला राजनीति करते रहे. या तो वो सीखना नहीं चाहते या पूरी अनिच्छा के साथ उन्हें राजनीति में ढकेल दिया गया है. या वे परिपक्व नहीं हैं क्योंकि उनकी राजनैतिक व्यवहार में कनेक्शन नहीं है. कनेक्ट होते हैं फिर डिसकनेक्ट हो जाते हैं. यूपी बिहार के बिजली की तरह हैं. जैसे बिजली आती है, जाने के लिए... निरंतरता नहीं है. फिर जनता उनसे कैसे कनेक्शन बनाए? अगर आपकी रूचि नहीं है तो कुछ और कीजिये, प्रियंका से पूछिये, उन्हें भी नहीं आना तो बैकग्राउंड में रहकर अपने संगठन, सरकार के ईमानदार लोगों को ज़िम्मेदारी दें. उन्हें संगठन का चेहरा बनाएं ।
जब निर्भया की आत्मा रो रही थी. पढ़ाई करने वाले, नौकरी करने वाले युवा लाठियां खा रहे थे - तब भी आप ग़ायब थे. क्यों नहीं आपने संदेश देने के लिए कमिश्नर, मंत्री को सस्पेंड किया? बहुत कुछ कर सकते थे जो आपने नहीं किया. अरविंद तो तब भी उस भीड़ में थे.
आपने कांग्रेस संगठन में कुछ जान फूंकने की कोशिश की पर वो भी ग़लत तरीक़े से. आपके पांच बार चुनकर आने वाले मुख्यमंत्री को आप से मिलने के लिए तीन दिन में भी समय नहीं मिलता, पर आपके दफ़्तर में आईआईएम से इंटर्नशिप कर सीख और सिखा रहे सहयोगियों को कभी भी मिलने की छूट है. राजनीति व्यापार चलाने से भिन्न है, राहुल जी! यहां जो व्यक्ति जनता के बीच में है वहीं आईआईएम का डीन है. कंसेप्ट पेपर, पीपीटी बनाने और लाखों, करोड़ों में चुनकर आने और लगातार चुनकर आने में बड़ा बुनियादी फ़र्क़ है. उन लोगों की क़द्र करें जिन्हें जनता का विश्वास मिला है. उन्हें बर्बाद न करें. हरीश रावत, जगनमोहन इसके उदाहरण हैं और नतीजे भी आपके सामने हैं.
आडवाणी, मोदी, केजरीवाल से मिलने में तो किसी को हफ़्ते नहीं लगते. आम व्यक्ति, पत्रकारों को तो छोड़ दें - अपने पार्टी के लोगों से तो मिला कीजिये. इतने छुई मुई के पौधे की तरह व्यवहार न करें. हिन्दुस्तान में जननेता बनना है तो सबके लिए दरवाज़े खोलने पडेंगे. लोगों से मिलना पड़ेगा. अपनी बात पहुंचानी होगी.
एकतरफ़ा संवाद नहीं चलेगा. संचार के इस युग में बराक ओबामा जब फ़ेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब पर सक्रिय हैं तो क्या आप बराक ओबामा से भी बड़े नेता हैं? आप के लिए फ़्री की सलाह है ज़िम्मेदारी को संभालना सीखें. ग़लती होने पर स्वीकारें, दूसरों को बलि का बकरा न बनाएं, क़द्दावर नेताओं की क़द्र करें, जो हैं वही दिखें और लोगों के लिए दरवाज़े खोलें. आपकी सरकार है - नए आइडिया को पुश् करें. कुछ तो ओरिजिनलटी दिखाएं. आपके पिता जी ने तो आपकी ही उम्र में कई क्रांतिकारी क़दम तकनीक और पंचायती राज्य की अवधारणा के रूप में स्थापित कर दिए थे ।आपकी पार्टी ने तो 20 वीं सदी का इतिहास लिखा आप कुछ तो लिखें.

#शंकर अर्निमेष [लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं । ये उनके निजी विचार हैं]

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