आप को शहरी अवधारणा समझने की भूल न करें

इतिहास में पहली बार चुनाव के बाद मिले जनादेश को अपनी तरह से व्याख्या कर सरकार बनाने का साहस अगर कोई पार्टी नहीं कर पा रही है तो केजरीवाल की सबसे बड़ी जीत यही है. चुनाव के बाद भी उन्हें जनता के झाडू का डर सता रहा है कि कहीं जल्दबाज़ी दिखाई, तोड़फोड़ की तो केजरीवाल की सेना लोक सभा में धुलाई न कर दे.
अगर केजरीवाल ग्रामीण लोकसभा की सीटों को छोड़ भी दें. केवल 200 शहरी सीटों पर नई शुचिता, जबाबदेही की राजनीति को उतारें तो लोकसभा का परिदृश्य कुछ और होगा. लेकिन केजरीवाल अर्बन (शहरी) अवधारणा हैं, इसे समझने की ग़लती न करें माननीय! बिना झुग्गी झोपड़ी, रिक्शेवाले, ठेलेवाले, ग़रीबों के वोट के केजरीवाल ये करिश्मा नहीं कर पाते.
ये भारतीय राजनीति का ऐतिहासिक पल है - जिसे जिया जाना चाहिये, जब सबसे बड़ी पार्टी की हिम्मत नहीं हो रही कि वो सरकार बनाने का दावा पेश करे. विधायकों को तोड़े, उन्हें अनुपस्थित कराए, पैसे पहुंचाए, मंत्री पद का लालच दे. सांप छछूंदर की लड़ाई हो गई है न उगलते बन रहा, न निगलते. अजीब माइंड गेम चल रहा है. सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी दूसरे नंबर की पार्टी से कह रही है आप सरकार नहीं बनाकर जनता को धोखा दे रहे है? झारखंड में तो नंबर नहीं होने पर भी आपने अपने प्रतिद्वंद्वी पार्टी जेएमएम से ही हाथ मिलाकर सरकार बना ली थी. क्या विधायकों को हवाई जहाज़, बस में भरकर रिसॉर्ट में क़ैद कर वोट चलवाने के दृश्य हम भूल गए है? कर्नाटक में देवगौड़ा, कुमारस्वामी के जेडीएस से मिलकर, उत्तर प्रदेश में केसरीनाथ त्रिपाठी का जनतांत्रिक कुकर्म क्या हम भूले हैं? कांग्रेस के इससे भी ज़्यादा उदाहरण हैं. लोकतंत्र की शुचिता को ख़त्म करने का. क्या भूलें क्या याद करें? पूरी किताब लिखी जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट को अपनी निगरानी में विश्वासमत कराने पड़े हैं. जो सरकार अविश्वास, धोखे से बन रही हो, जिस पर कोर्ट को भी भरोसा नहीं उस पर जनता कब तक भरोसा करती रहेगी, माननीय!
कांग्रेस जिस केजरीवाल से हारकर आई है उसे सरकार बनाने के लिए समर्थन देने को तैयार है. कुछ अजीब नहीं हो रहा? एक झटके में समझ, रणनीति, अनुभव सब हिचकोले खाने लगे? लगा नीचे तो ज़मीन ही नहीं थी हम ही ताक़तवर समझ रहे थे. ऐसा इसलिए कि नए आक्रोशित भारत को आप पुराने लालीपॉप से ही ठगना चाहते हो. सवाल नीयत का है.
भाई साहब! जनता ने सबसे ज़्यादा मैंडेट आपको दिया है फिर माइंड गेम क्यों खेल रहे हैं? किसे बेवक़ूफ़ बनाने के लिए? माइनॉरिटी सरकार बनाइए, पर बीजेपी सरकार नहीं बनाने का दिखावा कर रही है. टाइम बाई कर रही है. पर चलिये तात्कालिक ही सही इन्हें मध्यम वर्ग और यंग इंडिया का डर तो सता रहा है. ये पहली बार हो रहा है वरना चुनाव के बाद तो नेताओं को जनता फिर चुनाव के समय ही याद आती हैं. ये झाड़ू इफ़ेक्ट है.
इतिहास में पहली बार चुनाव के बाद मिले जनादेश को अपनी तरह से व्याख्या कर सरकार बनाने का साहस अगर कोई पार्टी नहीं कर पा रही है तो केजरीवाल की सबसे बड़ी जीत यही है. चुनाव के बाद भी उन्हें जनता के झाडू का डर सता रहा है कि कहीं जल्दबाज़ी दिखाई, तोड़फोड़ की तो केजरीवाल की सेना लोक सभा में धुलाई न कर दे.
एक   नए तरह की राजनीति का जन्म लेना लोकतंत्र के लिए जश्न मनाने का मौक़ा है. केजरीवाल ने इंदिरा गांधी के बाद के दौर में पनपी राजनीति के तौर तरीक़ों को बदल कर प्रचलित राजनीति करने वालों में एक सिहरन तो पैदा कर ही दी है कि क्या ये ट्रेंड यूनिवर्सल हो सकता है? क्या केजरीवाल राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली का जादू तो नहीं दिखा देंगे? अब तक नजरअंदाज करने वाले माइक्रोस्कोप लेकर केजरीवाल को देख रहे हैं. उन्हें समझने की कोशिश कर रहे हैं. कहीं केजरीवाल को समझने के लिए 'केजरीवाल की' न निकल जाए? केजरीवाल-एक्सपर्ट न पैदा हो जाएं. लोग कह रहे हैं कि जाति, संप्रदाय से घिरे राज्यों में क्या वो परचम लहरा पाएंगें? उन्हें सिरे से नकारने वाले भी पहले अपने दावे के ऊपर संशय कर रहे हैं या अपने विश्वास पर भी अविश्वास कर रहे हैं? इतना तो दिल्ली के नतीजों ने तय कर ही दिया है.
अब बात करते हैं केजरीवाल की. केजरीवाल को अपने राजनैतिक स्टार्ट-अप को स्केल करने के लिए पूरा देश पड़ा है. केजरीवाल ने व्यवस्था, राजनीति, मंहगाई, भ्रष्टाचार से त्रस्त मध्यम वर्ग, युवाओं, महिला मतदाताओं की एक नई जाति पैदा की है जो पुरानी जातियों से ज़्यादा विद्रोही है, जिसे अपनी ओरिजनल जाति से ज़्यादा घर, चूल्हा और रोज़गार की चिंता है. ये नई जाति पुरानी जातियों का नेतृत्व करेगी जैसे एक समय में अगड़ी जातियां या प्रभुत्ववाली जातियां मतदान के समय पिछड़ी जातियों का नेतृत्व करती थीं.
अगर केजरीवाल ग्रामीण लोकसभा की सीटों को छोड़ भी दें. केवल 200 शहरी सीटों पर नई शुचिता, जबाबदेही की राजनीति को उतारें तो लोकसभा का परिदृश्य कुछ और होगा. लेकिन केजरीवाल अर्बन (शहरी) अवधारणा हैं, इसे समझने की ग़लती न करें माननीय! बिना झुग्गी झोपड़ी, रिक्शेवाले, ठेलेवाले, ग़रीबों के वोट के केजरीवाल ये करिश्मा नहीं कर पाते. कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक को आप ने धोया है. उनका विश्वास एक नए विकल्प पर जमना कहानी कुछ और कहती है. हाँ, केजरीवाल की चुनौतियां आप से बड़ी हैं. शुचिता के सर्वाधिक मापदंड उन पर लागू होंगे. उनके उठने और गिरने के असीमित ख़तरे और संभावनाएं हैं. क्योंकि उमा भारती, राहुल गांधी बनना आसान है, शिवराज बनना कठिन है. लेकिन ये समझिए अगर ग़लतियां नहीं हुईं तो, जहां भी मंहगाई, भष्ट्राचार से आक्रोशित, जनमानस है बुझ रहा चूल्हा है वो केजरीवाल की जगह है. अंडरएस्टिमेट मत कीजिये फिर धोखा खाएंगे. हिन्दुस्तान बदल रहा है माननीय! आप भी बदलिये... नहीं तो झाडू खाइये.
#शंकर अर्निमेष [लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं । ये उनके निजी विचार हैं]

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