क्या वाकई आप पांचवीं पास से तेज हैं?

नीतीश एक ही मामले में मोदी को बीस पाते हैं – मगर वह उतने में ही खुश हैं – “हैं तो हम भी साधारण परिवार से लेकिन हमे चाय बेचने का कोई तजुर्बा नहीं है.”

दस्तक

झूठ घड़ी को लेकर एक किस्सा (चुटकुला) है.
मौत के बाद स्वर्ग पहुंचने पर एक शख्स एक दीवार पर टंगी ढेर सारी घड़ियां देखता है. देवदूत उसे बताता है कि हर व्यक्ति के लिए एक ‘झूठ घड़ी’ बनी होती है. जब भी कोई व्यक्ति धरती पर झूठ बोलता है – उसकी घड़ी की सूई आगे बढ़ जाती है.
दीवार पर एक घड़ी है जिसकी सूई कभी आगे नहीं बढ़ी. वह शख्स उसके बारे में पूछता है. देवदूत उसे बताता है – यह ‘मदर टेरेसा की घड़ी’ है – जो बताती है कि उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला.
इस पर वह शख्स नेताओं की घड़ी के बारे में पूछता है.
देवदूत उसे बताता है – ‘वह घड़ी उनके दफ्तर में’ है – जिसे ‘टेबल फैन’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है.
देश की सियासत के सबसे बड़े बयानबाज दिग्विजय सिंह ने इस किस्से को थोड़ा Modi-fy कर दिया है. प्रचलित किस्से में हल्के से - बड़ी - हेरफेर करते हुए ‘मदर टेरेसा’ की जगह ‘विवेकानंद’ को – और नेताओं की जगह ‘नरेंद्र मोदी’ को रिप्लेस कर दिया गया है. इसे Feku Wind Mill नाम दिया गया है.
[इसे यहां पढ़ सकते हैं.]

बैठक

मोदी का दावा है कि आज अखबार सरदार पटेल पर विज्ञापनों से पटे पड़े हैं, जबकि बीते दिनों में खोजने तक पर नहीं मिलते रहे. मोदी की यही बात तथ्यों से परे नहीं है. एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2001 और 2002 में सरदार पटेल के नाम पर एक भी विज्ञापन जारी नहीं हुए, जबकि पिछले चार साल में करोड़ों रुपये विज्ञापन पर खर्च किये. अब यहां यह बताने की तो जरुरत नहीं पड़नी चाहिए कि साल 1999 से 2004 तक केंद्र में एनडीए की सरकार रही – और इसी दौरान सरदार पटेल जयंती पर अखबार सूने पड़े रहे.
पटना की ‘हुंकार रैली’ में (नीतीश इसे अहंकार रैली करार देते हैं) नरेंद्र मोदी ने अपने एक मित्र की खूब चर्चा की – “जिसने जेपी को छोड़ दिया हो - वह बीजेपी को क्यों नहीं छोड़ सकता.”
मोदी ने अपने इस मित्र का नाम नहीं लिया - वैसे भी समझदार को (और समझदार का) इशारा काफी होता है.
मित्र ने मित्र के दिल से जुबां पर आई बात को दिल से लगाया और चुन चुन कर एक्सप्लेन किया.
‘अरे वाह! दोस्त तो झूठों का सरताज निकला.’
रैली के आगे-पीछे और दरम्यान हुए विस्फोटों के थमने का बाद बिहार के राजगीर में जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साथियों से मिले तो मित्रता का मुंहतोड़ जवाब दिया. [यहां शिवानंद तिवारी की बात को अगर इग्नोर मार दें]
नीतीश बोले...
मोदी ने - चंद्रगुप्त को गुप्त वंश का बताया, जबकि चंद्रगुप्त मौर्य वंश के संस्थापक थे.
मोदी ने - तक्षशिला को बिहार में बताया, जबकि यह जगह देश की सरहद के पार है.
मोदी ने - कहा था कि सिकंदर गंगा नदी के किनारे तक पहुंचे, जबकि सिकंदर गंगा नदी तक कभी नहीं पहुंचा - वह सतलज तक ही पहुंच पाया था.
मोदी ने - प्रधानमंत्री की दावत में मुलाकात का जिक्र किया, मगर (नीतीश ने कहा) प्रधानमंत्री की टेबल पर हम कभी साथ नहीं मिले.
मोदी अपने भाषणों में अपने मौलिक तर्क पेश करते हैं. कोई कहता है - गिलास आधा भरा है. कोई कहता है - गिलास आधा खाली है. मोदी कहते हैं - गिलास में आधा पानी है - और आधा हवा है. इस दौरान मोदी अपनी बात रखने के लिए आंकड़े भी पेश करते हैं.
मोदी ने हाल ही में कहा था कि चीन शिक्षा पर अपने जीडीपी का 20 फीसदी खर्च करता है जबकि भारत में यह आंकड़ा महज चार फीसदी है। चीन की समाचार एजेंसी मोदी के इस दावे को झुठला रही है. एजेंसी के मुताबिक यह आंकड़ा 3.93 फीसदी है.
सियासत का मौजूदा दौर इतिहास और भूगोल पर बहस कर रहा है.
पटना की रैली में मोदी इतिहास के जरिए खुद को बिहार से जोड़ने की कोशिश करते हैं. द्वारका से रिश्ते की दुहाई देते हुए खुद को यदुवंशियों का सबसे करीबी बता डालते हैं.
 सरदार पटेल किस दल के थे और उनकी विरासत का असली दावेदार कौन हो सकता है – इस पर दावों और प्रतिदावों की बरसात हो रही है.
मोदी के साथ मंच साझा करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरदार पटेल की विरासत पर अपनी दावेदारी ठोक दी. वह असली हकदार इसलिए हैं क्योंकि देश में सत्ताधारी उसी पार्टी के सदस्य हैं, जिसके सरदार पटेल रहे.
फिर मोदी पूछते हैं कि आखिर सरदार पटेल के सेक्युलरिज्म को ताक पर क्यों रख दिया जाता है? (मोदी ऊंची आवाज में सोमनाथ मंदिर का जिक्र तो करते हैं – लेकिन अयोध्या का नाम तक नहीं लेते.)
मोदी पूछते हैं कि आखिर कांग्रेस को पटेल इतने प्यारे क्यों हो गये हैं?
मोदी का दावा है कि आज अखबार सरदार पटेल पर विज्ञापनों से पटे पड़े हैं, जबकि बीते दिनों में खोजने तक पर नहीं मिलते रहे. मोदी की यह बात तथ्यों से परे नहीं है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2001 और 2002 में सरदार पटेल के नाम पर एक भी विज्ञापन जारी नहीं हुए, जबकि पिछले चार साल में करोड़ों रुपये विज्ञापन पर खर्च किये.
अब यहां यह बताने की तो जरुरत नहीं पड़नी चाहिए कि साल 1999 से 2004 तक केंद्र में एनडीए की सरकार रही – और इसी दौरान सरदार पटेल जयंती पर अखबार सूने पड़े रहे.

रुख़सत

बड़ी अच्छी बात है. अब सरदार पटेल की विरासत पर हक जताने के लिए उनकी राह पर चलने की शायद जरूरत नहीं है.
तो क्या सरदार पटेल की विरासत का असली हकदार वह होगा जो उनके नाम पर विज्ञापन पर [सरकारी खजाने से] सबसे ज्यादा खर्च करेगा.
एक बात और... नीतीश एक ही मामले में मोदी को बीस पाते हैं – मगर वह उतने में ही खुश हैं – “हैं तो हम भी साधारण परिवार से लेकिन हमे चाय बेचने का कोई तजुर्बा नहीं है.”

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